Toggle Test

भारत में दिव्यांगजनों के अधिकार और स्थिति: 2.68 करोड़ की आबादी से समान अवसर की लड़ाई तक

शिक्षा, रोजगार, गरिमा और समानता के संवैधानिक आधार; भेदभाव होने पर शिकायत का भी है कानूनी रास्ता

नई दिल्ली। भारत में दिव्यांगजन देश की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। जनगणना 2011 के अनुसार देश में 2,68,14,116 दिव्यांगजन दर्ज किए गए थे, जो उस समय की कुल आबादी का लगभग 2.21 प्रतिशत थे। यह आंकड़ा भले ही पुराना हो, लेकिन देश में दिव्यांगजनों की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और रोजगार संबंधी स्थिति को समझने के लिए यह अब भी प्रमुख आधिकारिक आधार है। भारत सरकार की जनगणना के विस्तृत आंकड़ों में दिव्यांगता को प्रकार, लिंग, आयु, शिक्षा और ग्रामीण-शहरी निवास जैसे विभिन्न आधारों पर दर्ज किया गया है।

दिव्यांगता केवल किसी व्यक्ति की शारीरिक या मानसिक स्थिति का विषय नहीं है। जब समाज, संस्थान, शिक्षा व्यवस्था, रोजगार व्यवस्था और सार्वजनिक स्थान किसी व्यक्ति की जरूरतों के अनुरूप नहीं होते, तब उसकी दिव्यांगता से जुड़ी चुनौतियां और बढ़ जाती हैं। इसी कारण भारत में कानून का जोर समानता, गैर-भेदभाव, सुगम्यता, समावेशी शिक्षा, रोजगार और गरिमापूर्ण जीवन पर है।

संविधान देता है समानता और गरिमा का आधार

भारतीय संविधान में दिव्यांगजनों के अधिकारों के लिए अलग से केवल छह अनुच्छेदों की सूची नहीं है, लेकिन कई संवैधानिक प्रावधान दिव्यांगजनों के अधिकारों की मजबूत नींव तैयार करते हैं।

1. समानता का अधिकार — अनुच्छेद 14

अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। इसका मूल सिद्धांत है कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ कानून के सामने समान व्यवहार हो।

दिव्यांगजनों के लिए यह सिद्धांत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समानता का अर्थ केवल सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर ऐसी व्यवस्था करना भी है जिससे व्यक्ति वास्तविक रूप से समान अवसर प्राप्त कर सके।

2. भेदभाव के विरुद्ध संवैधानिक संरक्षण — अनुच्छेद 15

अनुच्छेद 15 राज्य को निर्धारित आधारों पर भेदभाव से रोकता है। दिव्यांगता का उल्लेख अनुच्छेद 15 में अलग से आधार के रूप में नहीं है, लेकिन समानता और गरिमा की संवैधानिक भावना तथा बाद में बनाए गए विशेष कानूनों ने दिव्यांगजनों के लिए व्यापक सुरक्षा का रास्ता तैयार किया है।

इसी संवैधानिक भावना को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) ने अधिक स्पष्ट और विस्तृत कानूनी अधिकारों में बदला है।

3. सरकारी रोजगार में समान अवसर — अनुच्छेद 16

अनुच्छेद 16 सरकारी रोजगार में समान अवसर का संवैधानिक आधार प्रदान करता है। दिव्यांगजनों के लिए सरकारी नौकरियों में विशेष आरक्षण का विस्तृत प्रावधान RPwD Act, 2016 में किया गया है।

अधिनियम की धारा 34 के अनुसार सरकारी प्रतिष्ठानों में बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए कम से कम 4 प्रतिशत रिक्तियों के आरक्षण का प्रावधान है, निर्धारित श्रेणियों के अनुसार।

4. जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता — अनुच्छेद 21

अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। न्यायिक व्याख्या में गरिमा के साथ जीवन को भी इस अधिकार के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा गया है।

दिव्यांग व्यक्ति के लिए गरिमापूर्ण जीवन का अर्थ है कि उसे अपनी क्षमता के अनुसार शिक्षा, रोजगार, स्वतंत्र निर्णय, सामाजिक भागीदारी और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के अवसर मिलें।

5. शिक्षा का संवैधानिक आधार — अनुच्छेद 21A

अनुच्छेद 21A छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का संवैधानिक अधिकार देता है।

दिव्यांग बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार को RPwD Act, 2016 ने और मजबूत किया है। अधिनियम की धारा 31 के तहत बेंचमार्क दिव्यांगता वाले 6 से 18 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार दिया गया है।

इसके अलावा, धारा 32 के तहत सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों में बेंचमार्क दिव्यांगजनों के लिए कम से कम 5 प्रतिशत सीटों के आरक्षण का प्रावधान है।

6. सामाजिक सुरक्षा और सहायता — अनुच्छेद 41

अनुच्छेद 41 राज्य को अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर काम, शिक्षा तथा बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और दिव्यांगता जैसी परिस्थितियों में सार्वजनिक सहायता के लिए प्रभावी प्रावधान करने का निर्देश देता है।

इसी संवैधानिक दृष्टिकोण के आधार पर दिव्यांगजनों के लिए सामाजिक सुरक्षा, पुनर्वास, सहायता और कल्याणकारी योजनाओं की व्यवस्था विकसित हुई है।

भारत में दिव्यांगता के कितने प्रकार हैं?

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि RPwD Act, 2016 के तहत निर्दिष्ट दिव्यांगताओं की संख्या 7 से बढ़ाकर 21 की गई। भारत सरकार के दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के अनुसार वर्तमान कानूनी ढांचे में 21 निर्दिष्ट दिव्यांगताएं मान्य हैं।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—

– दृष्टिबाधिता और कम दृष्टि
– श्रवण बाधिता
– वाक् एवं भाषा दिव्यांगता
– चलने-फिरने संबंधी दिव्यांगता
– सेरेब्रल पाल्सी
– बौनापन
– कुष्ठ रोग से ठीक हुए व्यक्ति
– एसिड अटैक से प्रभावित व्यक्ति
– मस्कुलर डिस्ट्रॉफी
– ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर
– बौद्धिक दिव्यांगता
– विशिष्ट अधिगम दिव्यांगता
– मानसिक बीमारी
– मल्टीपल स्क्लेरोसिस
– पार्किंसंस रोग
– हीमोफीलिया
– थैलेसीमिया
– सिकल सेल रोग
– बहुदिव्यांगता
– बधिर-अंधता सहित संबंधित श्रेणियां
– अन्य अधिनियम में निर्दिष्ट श्रेणियां

कानून के तहत दिव्यांगता की पहचान और उसका प्रतिशत निर्धारित करने के लिए समय-समय पर सरकारी दिशानिर्देश जारी किए जाते हैं। दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग ने 14 मार्च 2024 को निर्दिष्ट दिव्यांगताओं के आकलन के लिए नवीनतम अधिसूचित दिशानिर्देश भी जारी किए हैं।

शिक्षा में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए विशेष अवसर

दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का अर्थ केवल स्कूल या कॉलेज में प्रवेश देना नहीं है। उन्हें ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जिसमें वे बिना अनावश्यक बाधाओं के पढ़ सकें।

RPwD Act समावेशी शिक्षा की अवधारणा को बढ़ावा देता है। इसमें उचित सुविधाएं, आवश्यक सहायता, सुलभ वातावरण और परीक्षा संबंधी उचित व्यवस्था महत्वपूर्ण हैं।

प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं के लिए भी दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए विशेष व्यवस्थाओं से संबंधित सरकारी दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग ने 2025 में प्रतियोगी लिखित परीक्षाओं के लिए संशोधित व्यापक दिशानिर्देश जारी किए थे और 2026 में उनकी लागू होने की स्थिति से संबंधित आगे के आदेश भी जारी किए हैं। इसलिए किसी परीक्षा में सुविधा लेने वाले अभ्यर्थी को संबंधित परीक्षा संस्था की नवीनतम अधिसूचना जरूर देखनी चाहिए।

रोजगार में आरक्षण और समान अवसर

दिव्यांगजनों के लिए रोजगार केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और स्वतंत्र जीवन का महत्वपूर्ण आधार है।

RPwD Act की धारा 34 सरकारी प्रतिष्ठानों में बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करती है। आरक्षण को अलग-अलग दिव्यांगता समूहों के अनुसार व्यवस्थित किया गया है।

इसके साथ ही कार्यस्थल को अधिक समावेशी और सुलभ बनाना, उचित सुविधा उपलब्ध कराना तथा दिव्यांगता के आधार पर अनुचित भेदभाव को रोकना भी महत्वपूर्ण है।

अगर दिव्यांग व्यक्ति के साथ भेदभाव हो तो शिकायत कहां करें?

यदि किसी दिव्यांग विद्यार्थी को स्कूल या कॉलेज में प्रवेश, परीक्षा, सुविधा या शिक्षा से संबंधित भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो सबसे पहले संबंधित संस्था के प्रधानाचार्य, प्राचार्य, शिकायत अधिकारी या संबंधित प्रशासन के समक्ष लिखित शिकायत की जा सकती है।

रोजगार से संबंधित मामले में संबंधित विभाग या संस्था के Grievance Redressal Officer अथवा निर्धारित शिकायत तंत्र का उपयोग किया जा सकता है।

यदि स्थानीय स्तर पर समस्या का समाधान नहीं होता, तो राज्य स्तर पर State Commissioner for Persons with Disabilities और संबंधित मामलों में केंद्र स्तर पर Chief Commissioner for Persons with Disabilities के समक्ष मामला उठाया जा सकता है।

शिकायत करते समय घटना की तारीख, स्थान, संबंधित अधिकारी/व्यक्ति का नाम, भेदभाव का विवरण और उपलब्ध दस्तावेजों की प्रतियां सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है।

UDID कार्ड भी महत्वपूर्ण दस्तावेज

दिव्यांगजनों के लिए Unique Disability ID (UDID) व्यवस्था का उद्देश्य दिव्यांगता प्रमाणपत्र और पहचान से संबंधित प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित बनाना है।

सरकारी UDID व्यवस्था के माध्यम से दिव्यांग व्यक्ति दिव्यांगता प्रमाणपत्र और UDID कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है, आवेदन की स्थिति देख सकता है तथा प्रमाणपत्र को डाउनलोड या प्रिंट कर सकता है। पोर्टल संबंधित चिकित्सा प्राधिकरण और जिला स्तर के अधिकारियों की जानकारी भी उपलब्ध कराता है।

आंकड़े बताते हैं बड़ी जिम्मेदारी

जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 2.68 करोड़ से अधिक दिव्यांगजन दर्ज किए गए थे। जनगणना के आधिकारिक आंकड़ों में दिव्यांगता के प्रकार के साथ-साथ लिंग, ग्रामीण-शहरी निवास, शिक्षा और रोजगार से जुड़े विवरण भी उपलब्ध हैं।

लेकिन 2011 के आंकड़ों को वर्तमान भारत की वास्तविक दिव्यांग जनसंख्या का नवीनतम अनुमान मानना उचित नहीं होगा। यह आधिकारिक जनगणना 2011 का आंकड़ा है और नई जनगणना के आंकड़े उपलब्ध होने पर तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी।

जरूरत सहानुभूति की नहीं, समान अवसर की

दिव्यांगजनों के अधिकारों की चर्चा करते समय सबसे महत्वपूर्ण बदलाव समाज की सोच में होना जरूरी है। दिव्यांग व्यक्ति को केवल सहायता का पात्र मानने के बजाय उसे अधिकारों वाले नागरिक के रूप में देखना होगा।

सुगम भवन, सुलभ परिवहन, समावेशी शिक्षा, रोजगार के अवसर, डिजिटल accessibility, उचित सुविधा और भेदभाव से सुरक्षा—ये सभी एक ऐसे समाज की पहचान हैं जहां व्यक्ति की दिव्यांगता उसकी क्षमता और अधिकारों के बीच बाधा नहीं बनती।

भारत में संवैधानिक मूल्यों और RPwD Act, 2016 का उद्देश्य भी यही है कि दिव्यांगजन समान अधिकार, समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन प्राप्त कर सकें। RPwD Act, 2016 और उससे जुड़े नियमों को भारत सरकार का दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग प्रशासित करता है।

निष्कर्ष

दिव्यांगता व्यक्ति की पहचान का एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन उसके अधिकारों की सीमा नहीं।
समानता तभी सार्थक होगी जब शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक सुविधाओं और सामाजिक जीवन में दिव्यांगजनों को वास्तविक अवसर मिलेंगे।

अब आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि कानून को जमीन पर लागू करने की है—ताकि हर दिव्यांग व्यक्ति अपने अधिकारों को जाने, भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाए और सम्मान के साथ समाज की मुख्यधारा में भागीदारी कर सके।

समान अधिकार • समान अवसर • सम्मानजनक जीवन

— Shubhda Shakti | Shaktiस्रोत: भारत की जनगणना 2011 के आधिकारिक दिव्यांगता आंकड़े और भारत सरकार का दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम/दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग ।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

Leave a Comment

और पढ़ें