दाखिला ही काफी नहीं: क्या देश के स्कूल दिव्यांग बच्चों को समान शिक्षा देने के लिए तैयार हैं?
रैंप से लेकर विशेष शिक्षक तक—सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन हर दिव्यांग बच्चे तक समान और सुलभ शिक्षा पहुंचाना अब भी बड़ी चुनौती

नई दिल्ली। देश में दिव्यांग बच्चों को सामान्य विद्यालयों में पढ़ने के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल अब भी बना हुआ है—क्या केवल विद्यालय में दाखिला मिल जाना ही समावेशी शिक्षा है?
हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने इसी मुद्दे की ओर ध्यान खींचा है। इसमें कहा गया है कि दिव्यांग बच्चों को सामान्य विद्यालयों से जोड़ने की दिशा में प्रगति हुई है, लेकिन प्रशिक्षित शिक्षकों, आवश्यक संसाधनों और बच्चों की अलग-अलग जरूरतों के अनुसार सहायता की उपलब्धता में अभी भी कमियां हैं।
सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन हर स्कूल तक नहीं पहुंचीं
सरकारी UDISE+ 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार देश के करीब 58.2 प्रतिशत विद्यालयों में रेलिंग सहित रैंप उपलब्ध थे। 2022-23 में यह आंकड़ा करीब 51 प्रतिशत था। यानी सुधार हुआ है, लेकिन बड़ी संख्या में विद्यालय अभी भी पूरी तरह सुलभ नहीं हैं।
दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष शिक्षकों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार के अनुसार 2025-26 में लगभग 1.17 लाख विद्यालयों में विशेष शिक्षक दर्ज थे। सामान्य विद्यालयों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए निर्धारित शिक्षक अनुपात की व्यवस्था भी की गई है।
सिर्फ रैंप बना देने से स्कूल समावेशी नहीं बनता
दिव्यांगता अलग-अलग प्रकार की होती है और प्रत्येक बच्चे की जरूरत भी अलग हो सकती है।
दृष्टिबाधित बच्चे को ब्रेल या सुनने योग्य अध्ययन सामग्री की आवश्यकता हो सकती है। श्रवण बाधित बच्चे को सांकेतिक भाषा और उचित संवाद व्यवस्था की जरूरत पड़ सकती है। बौद्धिक एवं विकासात्मक दिव्यांगता वाले बच्चों के लिए उनकी क्षमता के अनुरूप शिक्षण पद्धति और व्यक्तिगत सहायता जरूरी हो सकती है।
इसलिए विद्यालय की इमारत को सुलभ बनाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी पढ़ाई और पूरी शैक्षणिक व्यवस्था को सुलभ बनाना है।
सरकारी योजनाओं में हैं कई व्यवस्थाएं
समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए पहचान एवं मूल्यांकन शिविर, सहायक उपकरण, परिवहन सहायता, सहायक व्यक्ति की सुविधा, ब्रेल एवं बड़े अक्षरों वाली पुस्तकें और उपचारात्मक सहायता जैसी व्यवस्थाओं का प्रावधान है।
दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग भी अध्ययन सामग्री को ब्रेल, बोलती पुस्तकों, बड़े अक्षरों और अन्य सुलभ स्वरूपों में उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है।
सबसे बड़ी जरूरत—बच्चे को समझने वाला शिक्षक
किसी विद्यालय में आधुनिक सुविधाएं मौजूद हों, लेकिन शिक्षक दिव्यांग बच्चे की जरूरत और सीखने के तरीके को न समझे, तो समावेशी शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह सकता है।
इसीलिए सामान्य शिक्षकों को भी दिव्यांगता के प्रति संवेदनशील बनाने और अलग-अलग जरूरतों वाले बच्चों को पढ़ाने का प्रशिक्षण देना आवश्यक है। हाल के राष्ट्रीय समावेशी शिक्षा सम्मेलन में भी प्रारंभिक पहचान, विशेष सहायता केंद्र, सुलभ विद्यालय और शिक्षक प्रशिक्षण जैसे विषयों पर जोर दिया गया।
शुभदा शक्ति का सवाल—दाखिला मिला, लेकिन क्या बराबरी भी मिली?
किसी दिव्यांग बच्चे का विद्यालय में प्रवेश होना निश्चित रूप से पहला महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन समावेश का अर्थ केवल कक्षा में एक सीट उपलब्ध करा देना नहीं है।
असली सफलता तब होगी जब वह बच्चा बिना बाधा विद्यालय में प्रवेश कर सके, अपनी आवश्यकता के अनुसार पढ़ सके, खेल और अन्य गतिविधियों में भाग ले सके, प्रशिक्षित शिक्षक से सहायता पाए और उसे दूसरे बच्चों के समान सम्मान तथा अवसर मिलें।
अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “क्या दिव्यांग बच्चा सामान्य स्कूल में पढ़ सकता है?” सवाल यह होना चाहिए—“क्या हमारा स्कूल हर बच्चे को उसकी जरूरत के अनुसार पढ़ाने के लिए तैयार है?”
यही सोच दाखिले को शिक्षा और शिक्षा को वास्तविक सशक्तिकरण में बदल सकती है।
शुभदा शक्ति — दिव्यांगों को दुनिया और दुनिया को दिव्यांगों से जोड़ने की एक पहल।






