देश के 355 मेडिकल कॉलेजों में दिव्यांग सहायता इकाई नहीं, समावेशी चिकित्सा शिक्षा पर गंभीर सवाल
निर्देश कागजों तक सीमित, दिव्यांग विद्यार्थियों को आवश्यक सुविधाओं और मार्गदर्शन का अब भी इंतजार

नई दिल्ली/ अजमेर । देश में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए चिकित्सा शिक्षा को सुलभ और समावेशी बनाने के दावों के बीच चिंताजनक स्थिति सामने आई है। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत हलफनामे के अनुसार, देश के 798 मेडिकल कॉलेजों में से 355 ने अब तक अनिवार्य दिव्यांग सहायता इकाई स्थापित नहीं की है। इसका अर्थ है कि लगभग 44.5 प्रतिशत मेडिकल कॉलेज आयोग के निर्देश का पालन नहीं कर पाए हैं।
आयोग ने अपने अधीन आने वाले सभी मेडिकल कॉलेजों को विशेष सहायता की आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के लिए ऐसी इकाई बनाने का निर्देश दिया था। इसका उद्देश्य दिव्यांग विद्यार्थियों को उचित सुविधाएँ, शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय प्रशिक्षण में सहयोग तथा बाधारहित शिक्षण वातावरण उपलब्ध कराना है।
रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि कुछ कॉलेजों ने केवल औपचारिकता पूरी करते हुए सफाई निरीक्षक, रेजिडेंट डॉक्टर, ट्यूटर अथवा प्रधान लिपिक जैसे कर्मचारियों को इकाई का एकमात्र संपर्क अधिकारी बना दिया। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या ये अधिकारी दिव्यांगता, सुलभता, सहायक तकनीक और उचित सुविधाओं से जुड़ी विद्यार्थियों की विशेष आवश्यकताओं को समझने के लिए प्रशिक्षित हैं।
दिव्यांग सहायता इकाई केवल शिकायत दर्ज करने का कार्यालय नहीं होनी चाहिए। इसमें प्रशिक्षित समन्वयक, परामर्शदाता, सुलभ अध्ययन सामग्री, संकेत भाषा दुभाषिया, स्क्रीन रीडर, रैंप, लिफ्ट, सुलभ शौचालय और चिकित्सकीय प्रशिक्षण के दौरान आवश्यक सहायक उपकरण उपलब्ध होने चाहिए। साथ ही प्रत्येक विद्यार्थी की आवश्यकता का अलग-अलग आकलन किया जाना चाहिए।
आयोग के संशोधित दिशा-निर्देशों में भी दिव्यांगता के प्रकार या प्रतिशत के आधार पर उम्मीदवार को सीधे अयोग्य मानने के स्थान पर उसकी कार्यात्मक क्षमता और उचित सुविधाओं के साथ चिकित्सा पाठ्यक्रम पूरा करने की योग्यता के व्यक्तिगत मूल्यांकन पर जोर दिया गया है।
शुभदा शक्ति का मानना है कि दिव्यांग विद्यार्थी सहानुभूति नहीं, समान अवसर और अधिकार चाहते हैं। यदि मेडिकल कॉलेज प्रवेश तो देते हैं, लेकिन शिक्षण और प्रशिक्षण के दौरान आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराते, तो समावेशी शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
अब आवश्यकता है कि राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित करे, कॉलेजवार जानकारी सार्वजनिक करे और प्रत्येक सहायता इकाई का नियमित निरीक्षण कराए। चिकित्सा शिक्षा तभी वास्तविक रूप से समावेशी बनेगी, जब दिव्यांग विद्यार्थी बिना भेदभाव और बाधाओं के डॉक्टर बनने का अपना सपना पूरा कर सकेंगे।






