मां दुर्गा के दरबार में सब बराबर: दिव्यांगजन भी पूरे सम्मान से कर सकें दर्शन, बंगाल की पहल बने देश के लिए मिसाल ।
दुर्गा पूजा पंडालों में रैंप, ब्रेल-सांकेतिक भाषा, शांत क्षेत्र, सुलभ रास्ते और प्रशिक्षित स्वयंसेवकों पर जोर; शुभदा शक्ति का आग्रह—ऐसी व्यवस्था हर धार्मिक, सांस्कृतिक और सार्वजनिक आयोजन में हो

कोलकाता /अजमेर । त्योहार की असली खुशी तभी है, जब उसमें समाज का हर व्यक्ति बराबरी और सम्मान के साथ शामिल हो सके। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को के साथ मिलकर दुर्गा पूजा 2026 को दिव्यांगजन, बुजुर्गों और अन्य विशेष जरूरत वाले लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाने की पहल को आगे बढ़ाया है। यह अभियान दूसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका है और इस बार पश्चिम बंगाल के साथ दिल्ली-एनसीआर के पूजा आयोजकों को भी सुलभता संबंधी दिशा-निर्देशों का प्रशिक्षण दिया गया है।/
सिर्फ रैंप नहीं, पूरी व्यवस्था हो सुलभ
दिव्यांगजन के लिए किसी धार्मिक आयोजन को सुलभ बनाने का अर्थ केवल प्रवेश द्वार पर रैंप लगा देना नहीं है। दिशा-निर्देशों में भौतिक पहुंच, सुलभ सूचना एवं संवाद, सभी की भागीदारी वाले कार्यक्रम, आपातकालीन सुरक्षा, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और सम्मानजनक व्यवहार—इन छह प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं के लिए बाधारहित रास्ते और रैंप, दृष्टिबाधित लोगों के लिए ब्रेल व श्रव्य सूचना, श्रवण बाधित लोगों के लिए सांकेतिक भाषा, जरूरत के अनुसार बैठने और शांत स्थान तथा आपात स्थिति में सुरक्षित निकासी जैसी व्यवस्थाएं त्योहार को वास्तव में सबके लिए बना सकती हैं। पिछले वर्ष चुनिंदा पंडालों में ऐसी व्यवस्थाओं का प्रयोग भी किया गया था।
भीड़, सीढ़ियां और तेज आवाज बन सकती हैं बड़ी बाधा
विशाल धार्मिक आयोजनों में भीड़, असमान जमीन, सीढ़ियां, कम रोशनी और तेज आवाज जैसी स्थितियां कई दिव्यांगजनों के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं। इसलिए आयोजकों को शुरुआत से ही सुलभता को योजना का हिस्सा बनाने की जरूरत है, न कि आयोजन तैयार होने के बाद इसे अतिरिक्त सुविधा के रूप में जोड़ने की।
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ऐसी सुविधाओं का लाभ केवल दिव्यांगजन को नहीं मिलता। रैंप बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों के साथ आने वाले अभिभावकों और अस्थायी चोट से जूझ रहे लोगों के लिए भी उपयोगी होते हैं।
अधिकार है सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भागीदारी
भारत का दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संधि सांस्कृतिक जीवन में दिव्यांगजनों की समान भागीदारी के सिद्धांत को मान्यता देते हैं। दुर्गा पूजा जैसे विशाल आयोजनों में इन अधिकारों को जमीन पर लागू करना सामाजिक समावेशन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
शुभदा शक्ति की अपील—यह पहल केवल बंगाल तक क्यों रहे?
यह पहल केवल दुर्गा पूजा या पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मंदिर हो या मस्जिद, गुरुद्वारा हो या चर्च, मेला हो या उत्सव, कथा हो या सांस्कृतिक कार्यक्रम—जहां समाज जाता है, वहां दिव्यांगजन की गरिमापूर्ण और बाधारहित भागीदारी की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
राजस्थान सहित देशभर में बड़े धार्मिक मेलों, मंदिरों, उत्सवों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के आयोजक पहले से यह देखें कि व्हीलचेयर उपयोगकर्ता कैसे प्रवेश करेगा, दृष्टिबाधित व्यक्ति को दिशा कैसे मिलेगी, श्रवण बाधित व्यक्ति तक सूचना कैसे पहुंचेगी और किसी आपात स्थिति में दिव्यांग व्यक्ति को सुरक्षित बाहर कैसे निकाला जाएगा।
सुलभता को “विशेष सुविधा” नहीं, सामान्य व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा।
त्योहार तभी सबका है, जब उसमें हर कोई शामिल हो सके
आस्था किसी व्यक्ति की शारीरिक क्षमता नहीं देखती। इसलिए दर्शन और उत्सव का आनंद लेने के रास्ते भी किसी की दिव्यांगता के कारण बंद नहीं होने चाहिए।
शुभदा शक्ति का संदेश स्पष्ट है—पश्चिम बंगाल में शुरू हुई ऐसी पहल देश के हर शहर, हर धार्मिक स्थल और हर बड़े आयोजन तक पहुंचनी चाहिए। क्योंकि समावेशन का अर्थ किसी दिव्यांग व्यक्ति को अलग से सुविधा देना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें कोई भी व्यक्ति पीछे न छूटे।
शुभदा शक्ति — दिव्यांगों को दुनिया और दुनिया को दिव्यांगों से जोड़ने की एक पहल।






