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जी,सुना क्या ?? जन्माष्टमी के पहले भगवान ‘जगन्नाथ’ बनते है माता ‘देवकी’

जन्माष्टमी से पहले भगवान जगन्नाथ बनते हैं ‘माता देवकी’! प्रसव पीड़ा से लेकर बाल गोपाल के जन्म तक, पुरी की अद्भुत परंपरा

पुरी। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी से पहले ओडिशा के पुरी स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर में एक ऐसी अनूठी धार्मिक परंपरा निभाई जाती है, जिसके बारे में जानकर बहुत से श्रद्धालु हैरान रह जाते हैं। श्रीमंदिर की मान्यता में महाप्रभु जगन्नाथ को जन्माष्टमी से पहले माता देवकी के भाव में पूजा जाता है और श्रीकृष्ण के जन्म की पूरी लीला को प्रतीकात्मक धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से जीवंत किया जाता है।

इस विशेष परंपरा में ‘गर्भोदक बंदापना’ और ‘जेऊठ/जेउटा भोग’ का खास महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार महाप्रभु जगन्नाथ सभी अवतारों के मूल स्रोत अर्थात ‘अवतारी’ हैं। इसी आध्यात्मिक अवधारणा को दर्शाने के लिए श्रीकृष्ण जन्म से पहले महाप्रभु में मातृत्व का भाव स्थापित किया जाता है।

भगवान जगन्नाथ ही क्यों बनते हैं ‘माता’?

जगन्नाथ संस्कृति में महाप्रभु को केवल एक देव स्वरूप तक सीमित नहीं माना जाता। उनमें माता और पिता दोनों के भाव की कल्पना की जाती है। जन्माष्टमी की इस विशेष लीला में भगवान जगन्नाथ को माता देवकी के स्वरूप और भाव में देखा जाता है, जिनसे भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य होना है।

यह कोई सामान्य पूजा नहीं, बल्कि श्रीमंदिर की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं का हिस्सा है। जन्माष्टमी से पहले होने वाले अनुष्ठानों में श्रीकृष्ण जन्म की तैयारी की जाती है।

क्या है ‘गर्भोदक बंदापना’?

संध्या धूप की नीति के बाद महाप्रभु की विशेष बंदापना की जाती है। इसी क्रम में भगवान जगन्नाथ के लिए अलग से होने वाली बंदापना को ‘गर्भोदक बंदापना’ कहा जाता है।

इस अनुष्ठान के पीछे का आध्यात्मिक भाव बेहद रोचक है—महाप्रभु स्वयं वह परम सत्ता हैं जिनसे अवतार प्रकट होते हैं। इसलिए कृष्ण जन्म की लीला में वही माता के रूप में भी प्रतिष्ठित होते हैं और उन्हीं से श्रीकृष्ण के प्राकट्य का भाव प्रस्तुत किया जाता है।

‘प्रसव पीड़ा’ में महाप्रभु को दिया जाता है विशेष भोग

इस परंपरा का एक और अत्यंत रोचक हिस्सा है ‘जेऊठ’ या ‘जेउटा भोग’

धार्मिक परंपरा में इसे मातृत्व और प्रसव से जुड़े भाव से जोड़ा जाता है। महाप्रभु को यह विशेष भोग अर्पित करने के बाद सेवायत बंदापना की धार्मिक प्रक्रिया पूरी करते हैं। मान्यता में इसे प्रसव पीड़ा से राहत देने वाले भोग के रूप में देखा जाता है।

यानी यहां भगवान की पूजा केवल आराध्य के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी ‘माता’ के भाव में की जाती है जो अपने शिशु के जन्म की प्रतीक्षा कर रही है।

फिर आता है श्रीकृष्ण जन्म का क्षण

जन्माष्टमी के दिन श्रीमंदिर में श्रीकृष्ण जन्म से संबंधित अलग-अलग धार्मिक नीतियां संपन्न होती हैं। मंदिर परंपरा के अनुसार जन्म से जुड़े स्थान की शुद्धि की जाती है, विशेष मंडल बनाया जाता है और संकल्प सहित विभिन्न पूजन संपन्न होते हैं।

इसके बाद श्रीकृष्ण जन्म की लीला आगे बढ़ती है। पूरी प्रक्रिया में देवकी, कृष्ण जन्म और उससे जुड़े प्रसंगों को मंदिर की प्राचीन सेवा-परंपरा के अनुसार प्रतीकात्मक रूप दिया जाता है।

‘आज माता, कल पुत्र…’

इस परंपरा का सबसे गहरा संदेश शायद यही है कि जगन्नाथ संस्कृति में ईश्वर को किसी एक संबंध में बांधा नहीं गया है। वे भक्त के लिए पिता भी हैं, माता भी, पुत्र भी और स्वयं समस्त अवतारों के स्रोत भी।

यही कारण है कि जन्माष्टमी के अवसर पर पुरी का श्रीमंदिर केवल कृष्ण जन्म का उत्सव नहीं मनाता, बल्कि मातृत्व, जन्म, वात्सल्य और ईश्वर के सार्वभौमिक स्वरूप की एक विलक्षण आध्यात्मिक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है।

पुरी की यह परंपरा बताती है कि भारतीय सनातन संस्कृति में ईश्वर और भक्त के रिश्ते कितने विविध और भावपूर्ण हो सकते हैं—जहां जगत का पालनहार स्वयं ‘माता’ के भाव में प्रतिष्ठित होकर बाल गोपाल के जन्म की लीला का माध्यम बन जाता है।

स्रोत: जगन्नाथ परंपरा से संबंधित प्रकाशित संदर्भ।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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