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डिजिटल दुनिया में कितने सुरक्षित हैं बच्चे? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

बाल संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: सोशल मीडिया पर बच्चों के यौन शोषण वाले कंटेंट को लेकर केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रसार और उसकी रिपोर्टिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि सोशल मीडिया कंपनियां Child Sexual Exploitation and Abuse Material (CSEAM) से जुड़े मामलों में कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का प्रभावी तरीके से पालन कर रही हैं या नहीं।

मामला Just Rights for Children Alliance बनाम S. Harish से संबंधित कार्यवाही में दायर एक आवेदन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया इंटरमीडियरी द्वारा बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री की अनिवार्य रिपोर्टिंग सुनिश्चित कराने और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू कराने की मांग की है।

केंद्र के दो मंत्रालयों को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। अदालत ने संबंधित सोशल मीडिया/ऑनलाइन इंटरमीडियरी को भी कार्यवाही में पक्षकार बनाने को कहा है, ताकि उनकी जिम्मेदारियों और अनुपालन की स्थिति पर विचार किया जा सके।

केंद्र सरकार से इस मामले में जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार मंत्रालयों को 24 सितंबर 2026 तक जवाब दाखिल करना है और उसकी प्रति याचिकाकर्ताओं को दो सप्ताह पहले उपलब्ध करानी होगी।

आखिर क्या है CSEAM?

CSEAM यानी Child Sexual Exploitation and Abuse Material ऐसी तस्वीरों, वीडियो या अन्य सामग्री के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है, जिनमें बच्चों के यौन शोषण या दुर्व्यवहार को दर्शाया गया हो।

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2024 के अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि ऐसी सामग्री को केवल ‘पोर्नोग्राफी’ के रूप में देखना इसकी गंभीरता को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं करता। अदालत ने CSEAM शब्द को अधिक उपयुक्त माना, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि ऐसी सामग्री वास्तव में बच्चे के शोषण और दुर्व्यवहार का रिकॉर्ड है।

सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी पर सवाल

याचिका में यह मुद्दा उठाया गया है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर CSEAM पाए जाने पर संबंधित सोशल मीडिया कंपनियां क्या भारतीय कानून के तहत आवश्यक रिपोर्टिंग और अन्य दायित्वों का पूरी तरह पालन कर रही हैं। याचिका में अदालत के 2024 के निर्देशों के प्रभावी अनुपालन की मांग की गई है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब केंद्र सरकार भी ऑनलाइन बाल सुरक्षा को लेकर सख्ती बढ़ा रही है। जुलाई 2026 में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बताया था कि सोशल मीडिया पर CSAM से जुड़े कथित विज्ञापनों की रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए संबंधित इंटरमीडियरी से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने भी संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को नोटिस जारी किया था।

POCSO और IT कानून भी महत्वपूर्ण

भारत में बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने के लिए Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act, 2012 प्रमुख कानून है। इसके अलावा डिजिटल माध्यम में बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री के मामलों में सूचना प्रौद्योगिकी कानून के प्रावधान भी महत्वपूर्ण हैं।

सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले में POCSO की धारा 19 और 20 के तहत रिपोर्टिंग दायित्वों पर विस्तार से विचार किया गया था। उसी फैसले में अदालत ने बच्चों से जुड़ी यौन शोषण सामग्री के संदर्भ में कानून की व्याख्या करते हुए ऑनलाइन गतिविधियों की गंभीरता को रेखांकित किया था।

दिव्यांग बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान जरूरी

शुभदा शक्ति विशेष: डिजिटल सुरक्षा की चर्चा में दिव्यांग बच्चों की आवश्यकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बौद्धिक, संचार या अन्य प्रकार की दिव्यांगता वाले कुछ बच्चों को ऑनलाइन जोखिमों को पहचानने, संदिग्ध व्यक्ति के व्यवहार को समझने या शोषण की जानकारी विश्वसनीय व्यक्ति तक पहुंचाने में अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है।

इसलिए ऑनलाइन बाल संरक्षण व्यवस्था को सुलभ (Accessible) और समावेशी (Inclusive) बनाना जरूरी है। शिकायत और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसे अलग-अलग प्रकार की दिव्यांगता वाले बच्चे और उनके अभिभावक आसानी से समझ और इस्तेमाल कर सकें।

अभिभावकों, शिक्षकों और देखभाल करने वालों के लिए भी डिजिटल सुरक्षा की जानकारी सुलभ स्वरूप में उपलब्ध कराना आवश्यक है। बच्चों को यह समझाना महत्वपूर्ण है कि इंटरनेट पर कोई व्यक्ति निजी तस्वीर या वीडियो मांगे, असहज बातचीत करे या किसी बात को माता-पिता से छिपाने के लिए कहे तो इसकी जानकारी तुरंत किसी विश्वसनीय वयस्क को दें।

डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा सामूहिक जिम्मेदारी

इंटरनेट बच्चों के लिए शिक्षा, मनोरंजन और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है, लेकिन इसके साथ ऑनलाइन शोषण के खतरे भी मौजूद हैं। ऐसे में सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों, कानून-प्रवर्तन एजेंसियों, स्कूलों और अभिभावकों—सभी की जिम्मेदारी है कि बच्चों के लिए डिजिटल दुनिया को सुरक्षित बनाया जाए।

सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह कार्यवाही इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका केंद्र केवल आपत्तिजनक सामग्री हटाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री सामने आने पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से पालन करें।

शुभदा शक्ति का मानना है कि डिजिटल सुरक्षा का अधिकार हर बच्चे का है और इसमें दिव्यांग बच्चों की सुरक्षा, गरिमा और पहुंच को समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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