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जी सुना क्या ?? “सहानुभूति नहीं, सुविधा और अवसर चाहिए: गांवों तक पहुंचे दिव्यांग सेवाएं”

गांवों तक क्यों नहीं पहुंच पाती दिव्यांग सेवाएं? नागालैंड से उठा सवाल, पूरे देश के लिए बड़ा संदेश

राज्यपाल नंद किशोर यादव ने कहा—दिव्यांगजनों को सहानुभूति नहीं, सम्मान, समान अवसर और आत्मनिर्भरता चाहिए; स्वास्थ्य, पुनर्वास और सहायक उपकरणों की सेवाएं गांवों तक पहुंचाने पर दिया जोर ।

कोहिमा / अजमेर  दिव्यांगजन से जुड़ी योजनाएं और सुविधाएं यदि केवल राज्य या जिला मुख्यालय तक सीमित रह जाएं, तो दूरदराज के गांवों में रहने वाला व्यक्ति उनका लाभ कैसे उठाएगा?ajmer नागालैंड के राज्यपाल नंद किशोर यादव ने इसी महत्वपूर्ण मुद्दे को सामने रखते हुए कहा है कि दिव्यांगजनों के लिए समावेशी सेवाएं हर गांव और समुदाय तक पहुंचनी चाहिए।

1 अक्टूबर को कोहिमा में Nagaland Parents’ Association for the Disabled (NAPAD) द्वारा आयोजित 100th Regional Parents’ Meet 2026 में राज्यपाल ने कहा कि दृष्टिकोण को केवल देखभाल तक सीमित रखने के बजाय “Care to Empowerment” की दिशा में आगे बढ़ना होगा। कार्यक्रम की थीम भी “From Care to Empowerment: Building Inclusive Communities through Strong Families and Collective Action” थी।

गांव तक पहुंचें Therapy, Rehabilitation और Assistive Devices

नागालैंड की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और दूर-दूर बसे गांवों का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने विकेंद्रीकृत व्यवस्था की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि specialised healthcare, rehabilitation, assistive devices और inclusive education जैसी सुविधाओं को लोगों के करीब लाना होगा। Technology और tele-consultation भौगोलिक दूरी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

यह मुद्दा केवल नागालैंड तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। यह एक व्यापक सवाल सामने रखता है—योजना या सुविधा उपलब्ध होना पर्याप्त है, या उसकी वास्तविक पहुंच भी सुनिश्चित होनी चाहिए?

शुरुआती पहचान से रोजगार तक बने पूरी व्यवस्था

राज्यपाल ने disability की early identification और intervention के लिए परिवारों, आंगनवाड़ी केंद्रों, स्कूलों, स्वास्थ्यकर्मियों और चिकित्सा पेशेवरों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया। साथ ही शिक्षा से skill development, फिर employment और economic independence तक मजबूत रास्ता बनाने की बात कही।

उन्होंने inclusive schools, accessible infrastructure, उपयुक्त learning material और trained teachers की आवश्यकता भी रेखांकित की। रोजगार के क्षेत्र में उनका जोर इस बात पर था कि दिव्यांगजनों को उनकी क्षमता और प्रदर्शन के आधार पर भर्ती, प्रशिक्षण और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें।

केवल सहानुभूति नहीं, निर्णयों में भागीदारी भी

इस चर्चा का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक सोच से जुड़ा है। राज्यपाल के अनुसार दिव्यांगजनों को केवल सहानुभूति की आवश्यकता नहीं है; उन्हें सम्मान, समान अवसर और बाधाओं को दूर करने वाली व्यवस्था चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि दिव्यांगजनों से जुड़े निर्णयों में उनके अनुभव और उनकी आवाज केंद्र में होनी चाहिए।

यह विचार disability inclusion के मूल प्रश्न को सामने लाता है—“हम उनके लिए क्या कर सकते हैं?” के साथ-साथ “वे स्वयं क्या चाहते हैं?” सुनना भी जरूरी है।

पहले भी उठ चुका है गांव स्तर पर सुविधाओं का मुद्दा

मई 2026 में राज्यपाल ने नागालैंड के Social Welfare Department की समीक्षा के दौरान disability certificates के लिए block और village-level camps आयोजित करने का सुझाव दिया था, ताकि पात्र लोगों को सरकारी लाभ प्राप्त करने में आसानी हो। इसी वर्ष Peren जिले में UDID cards में देरी का मामला सामने आने के बाद राज्यपाल के हस्तक्षेप से तीन आवेदकों को कार्ड जारी किए गए थे।

शुभदा शक्ति का नजरिया

दिव्यांग सशक्तिकरण की असली परीक्षा किसी योजना की घोषणा नहीं, बल्कि उसकी last-mile accessibility है। यदि किसी ग्रामीण परिवार को disability certificate, therapy, assistive device, inclusive education या rehabilitation के लिए बार-बार शहर जाना पड़े, तो दूरी स्वयं एक नई बाधा बन जाती है।

इसलिए गांव तक सेवा पहुंचाने के साथ स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित मानव संसाधन, accessible information, नियमित camps, tele-rehabilitation और समयबद्ध referral system जैसे उपायों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।

सवाल बड़ा है—क्या दिव्यांगजन को सुविधा तक पहुंचना चाहिए, या व्यवस्था को दिव्यांगजन तक पहुंचना चाहिए?

आपकी क्या राय है? अपने विचार शुभदा शक्ति के साथ साझा करें।

शुभदा शक्ति — दिव्यांगों को दुनिया और दुनिया को दिव्यांगों से जोड़ने की एक पहल।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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