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जी,सुना क्या?? “BRICS ने फिर छेड़ा वही राग, जिसे सुन ट्रंप के सीने पर लोटने लगेगा सांप ! आखिर क्या है पूरा खेल?”

BRICS Summit 2026: डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में BRICS का बड़ा कदम, ट्रंप की चेतावनी के बीच फिर उठा ‘लोकल करेंसी’ का मुद्दा

नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में आयोजित 18वें BRICS Summit में एक बार फिर दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा सामने आया है। BRICS देशों ने आपसी व्यापार और निवेश में स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) के इस्तेमाल को बढ़ावा देने तथा सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को अधिक तेज, सस्ता और प्रभावी बनाने की दिशा में काम आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप BRICS की ओर से डॉलर के विकल्प की संभावनाओं को लेकर पहले ही कड़ी चेतावनी दे चुके हैं।

डॉलर को हटाना नहीं, लेकिन निर्भरता कम करने की कोशिश

BRICS को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है कि क्या यह समूह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपनी कोई साझा करेंसी तैयार करेगा। हालांकि नई दिल्ली में भारत ने स्थिति स्पष्ट कर दी है—फिलहाल BRICS की कोई साझा करेंसी बनाने का प्रस्ताव नहीं है।

भारत का जोर इसके बजाय इस बात पर है कि BRICS सदस्य देश द्विपक्षीय व्यापार में अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं का अधिक इस्तेमाल करें। इससे लेन-देन की लागत कम हो सकती है और भुगतान व्यवस्था अधिक सुविधाजनक बन सकती है।

नई दिल्ली घोषणा में भी BRICS Payment Task Force के काम का उल्लेख करते हुए सदस्य देशों की भुगतान और मैसेजिंग प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल तथा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश को प्रोत्साहित करने पर चर्चा को आगे बढ़ाने की बात कही गई है।

ट्रंप को क्यों है BRICS के इस कदम से चिंता?

डोनाल्ड ट्रंप BRICS की संभावित वैकल्पिक मुद्रा को लेकर पहले बेहद आक्रामक रुख अपना चुके हैं। जनवरी 2025 में उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि BRICS देश नई मुद्रा बनाते हैं या अमेरिकी डॉलर की जगह किसी दूसरी मुद्रा को समर्थन देते हैं, तो उन्हें भारी अमेरिकी टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है।

यही वजह है कि BRICS देशों द्वारा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की हर पहल को डॉलर के वैश्विक दबदबे से जोड़कर देखा जाता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना और डॉलर को वैश्विक व्यवस्था से हटाना एक ही बात नहीं है। भारत ने स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि व्यापारिक भुगतान को अधिक व्यावहारिक और कम खर्चीला बनाना है।

डिजिटल पेमेंट भी बन सकता है BRICS का नया हथियार

भारत की दिलचस्पी केवल रुपये, युआन या अन्य राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान तक सीमित नहीं है। भारत BRICS देशों की Central Bank Digital Currencies (CBDCs) और भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी की संभावनाओं पर भी काम आगे बढ़ाना चाहता है।

इसका उद्देश्य ऐसा तंत्र विकसित करना है जिससे सदस्य देशों के बीच सीमा-पार भुगतान ज्यादा तेज और सस्ता हो सके। हालांकि अलग-अलग देशों की वित्तीय प्रणालियों, राजनीतिक संबंधों और तकनीकी ढांचे के कारण इसे लागू करना आसान नहीं होगा।

क्या वास्तव में कमजोर हो जाएगा डॉलर?

फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। अमेरिकी डॉलर आज भी वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। BRICS ने भी नई दिल्ली सम्मेलन में डॉलर को हटाने या उसके मुकाबले नई साझा मुद्रा लॉन्च करने का फैसला नहीं किया है।

लेकिन यदि BRICS देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार लगातार बढ़ता है और वैकल्पिक cross-border payment systems विकसित होते हैं, तो लंबे समय में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के कुछ हिस्सों में डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है।

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है—BRICS फिलहाल डॉलर को चुनौती देने के लिए नई करेंसी नहीं बना रहा, लेकिन वह ऐसी वित्तीय व्यवस्था की नींव मजबूत करने की कोशिश जरूर कर रहा है जिसमें हर अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए डॉलर पर निर्भर रहना जरूरी न हो।

और शायद यही वह बात है, जिस पर वॉशिंगटन की नजर सबसे ज्यादा रहेगी।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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