एक रात में बनीं कामाख्या की सीढ़ियां अधूरी क्यों रह गईं? रहस्य, छल और नरकासुर की हैरतअंगेज कथा

असम के गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या मंदिर जितना आस्था का केंद्र है, उतना ही रहस्य और प्राचीन लोककथाओं से घिरा हुआ भी। मंदिर तक पहुंचने वाले मार्ग के बीच मौजूद पत्थरों की अधूरी सीढ़ियां आज भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों को हैरान करती हैं। आखिर इन्हें किसने बनाया और पूरा होने से पहले ही निर्माण क्यों रुक गया? इसका उत्तर इतिहास से अधिक उस रोमांचक लोककथा में मिलता है, जिसके केंद्र में असुरराज नरकासुर और देवी कामाख्या हैं।
प्रचलित मान्यता के अनुसार, शक्तिशाली नरकासुर देवी कामाख्या के सौंदर्य और दिव्य शक्ति से मोहित हो गया था। उसने देवी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। देवी उससे विवाह नहीं करना चाहती थीं, लेकिन सीधे मना करने के बजाय उन्होंने ऐसी कठिन शर्त रखी, जिसे पूरा करना लगभग असंभव था।
देवी ने कहा—यदि नरकासुर एक ही रात में नीलाचल पर्वत के नीचे से मंदिर तक पत्थरों की सीढ़ियां, विश्राम-स्थल और जलकुंड बना देगा तो वह उससे विवाह कर लेंगी। अपनी शक्ति के अहंकार में डूबे नरकासुर ने चुनौती स्वीकार कर ली।
रात का अंधेरा गहराते ही पहाड़ी पर निर्माण शुरू हो गया। विशाल पत्थर एक के बाद एक सीढ़ियों का आकार लेने लगे। कहा जाता है कि नरकासुर इतनी तीव्र गति से काम कर रहा था कि भोर होने से पहले ही निर्माण लगभग पूरा होने वाला था। यह देखकर देवी कामाख्या चिंतित हो गईं। उन्होंने अपनी माया से एक मुर्गे को समय से पहले बांग देने के लिए प्रेरित किया।
मुर्गे की आवाज सुनते ही नरकासुर ने समझा कि सूर्योदय हो चुका है और वह शर्त हार गया। क्रोध में उसने उस मुर्गे का पीछा किया और उसे मार डाला। लोकमान्यता के अनुसार, जहां मुर्गे को मारा गया वह स्थान ‘कुकुराकाटा’ कहलाया, जबकि नरकासुर द्वारा बनाया गया अधूरा मार्ग ‘मेखेला उजुवा पथ’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

आज भी इस प्राचीन मार्ग और पत्थर की सीढ़ियों को देखकर लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं। रात के सन्नाटे, घने पेड़ों और तांत्रिक परंपराओं से जुड़े कामाख्या क्षेत्र के कारण इस कथा को कई बार डरावना रूप भी दे दिया जाता है। सीढ़ियों के आसपास रहस्यमय आवाजें सुनाई देने अथवा श्राप होने जैसे दावे सोशल मीडिया पर किए जाते हैं, लेकिन इनके समर्थन में कोई विश्वसनीय ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
कामाख्या की अधूरी सीढ़ियों का असली आकर्षण भय में नहीं, बल्कि आस्था, लोकस्मृति और सदियों से जीवित उस कथा में है, जहां शक्ति के सामने अहंकार पराजित होता है। ये सीढ़ियां मानो आज भी प्रश्न करती हैं—उस रात मुर्गे ने वास्तव में बांग दी थी या यह देवी की माया थी?






