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खतरे में मासूमियत ! आखिर बेटियां कहां सुरक्षित?

स्मार्टफोन में खो गया बचपन, खतरे में मासूमियत! बेटियां कहां सुरक्षित, बेटों को संस्कार देना क्यों भूल रहे हैं हम?

देहरादून में छह साल की बच्ची से कथित यौन हिंसा ने झकझोरा समाज; अश्लील सामग्री तक बच्चों की पहुंच, कमजोर पारिवारिक संवाद और नैतिक शिक्षा पर गंभीर सवाल—क्या केवल बेटियों को सावधान करना ही समाधान है?

शुभदा शक्ति न्यूज़ | विशेष संपादकीय।

जिस उम्र में बच्चों के हाथों में खिलौने, किताबें और रंगीन पेंसिल होनी चाहिए, उस उम्र में स्मार्टफोन की स्क्रीन उनकी दुनिया बनती जा रही है। बचपन के खेल, रिश्तों की मिठास, दादा-दादी की कहानियां और परिवार का सान्निध्य धीरे-धीरे डिजिटल दुनिया की चमक में पीछे छूटते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में देहरादून में छह वर्षीय मासूम बच्ची के साथ कथित यौन हिंसा की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है।

इस घटना में पड़ोसी नाबालिग पर गंभीर आरोप लगे हैं। अश्लील सामग्री देखने से जुड़ी बात भी सामने आई है। हालांकि किसी अपराध का कारण केवल स्मार्टफोन या अश्लील सामग्री को मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन इस घटना ने बच्चों की डिजिटल सुरक्षा, पारिवारिक संस्कार और समाज की जिम्मेदारी पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि हम बच्चों को आधुनिक तकनीक तो दे रहे हैं, लेकिन क्या उन्हें सही और गलत, मर्यादा और सहमति, सम्मान और जिम्मेदारी का अंतर भी सिखा रहे हैं?

कहां खो गया वह मासूम बचपन?

कभी बच्चों का बचपन खुले मैदानों, दोस्तों के साथ खेलकूद, परिवार की बातचीत और सामाजिक गतिविधियों के बीच गुजरता था। आज अनेक घरों में बच्चे को चुप कराने, खाना खिलाने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल पकड़ा देना आसान विकल्प बन गया है।

स्मार्टफोन ज्ञान और शिक्षा का उपयोगी माध्यम है, लेकिन उसका अत्यधिक और अनियंत्रित इस्तेमाल बच्चों की नींद, शारीरिक गतिविधियों, पारिवारिक संवाद और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है। विशेष चिंता तब होती है, जब बच्चे उम्र के प्रतिकूल अश्लील या हिंसक सामग्री तक पहुंच जाते हैं।

समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसके उपयोग में मार्गदर्शन, निगरानी और संतुलन की कमी है।

अश्लील वीडियो और बच्चों का व्यवहार: खतरे को समझना जरूरी

इंटरनेट पर उपलब्ध यौन सामग्री में कई बार संबंधों, सहमति और व्यक्तिगत सीमाओं की वास्तविक समझ नहीं दिखाई जाती। कम उम्र के बच्चे ऐसी सामग्री को गलत तरीके से समझ सकते हैं।

विशेषज्ञ दृष्टिकोण से यह समझना आवश्यक है कि किसी बच्चे का हिंसक या अनुचित व्यवहार केवल एक वीडियो देखने से पैदा नहीं होता। इसके पीछे व्यक्तिगत, मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियां भी हो सकती हैं।

इसलिए बच्चों को केवल डराना या मोबाइल छीन लेना पर्याप्त नहीं है। उन्हें उम्र के अनुरूप सही जानकारी, सहमति, शारीरिक सीमाओं और दूसरों की गरिमा का सम्मान करना सिखाना होगा।

बेटियों पर पाबंदियां, बेटों की परवरिश पर चुप्पी क्यों?

हमारे समाज में बेटियों को अक्सर समझाया जाता है कि अकेले मत जाना, सावधान रहना, किसी पर जल्दी भरोसा मत करना। सुरक्षा संबंधी सावधानियां जरूरी हैं, लेकिन क्या हमने कभी उतनी ही गंभीरता से अपने बेटों को समझाया कि किसी लड़की या महिला की इच्छा के विरुद्ध किया गया व्यवहार गलत और अपराध भी हो सकता है?

बेटों को बचपन से यह सिखाना होगा कि महिलाओं का सम्मान केवल एक सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि समानता और मानवीय गरिमा का मूल सिद्धांत है। किसी को उसकी इच्छा के विरुद्ध छूना, डराना, परेशान करना या दबाव डालना स्वीकार्य नहीं है।

बेटियों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल बेटियों पर नहीं डाली जा सकती। बेटों को जिम्मेदार, संवेदनशील और सम्मानजनक व्यवहार सिखाना भी समाज का अनिवार्य दायित्व है।

बेटे को सही संस्कार कैसे दें अभिभावक?

संस्कार केवल धार्मिक या नैतिक उपदेशों से नहीं आते। बच्चे अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों का व्यवहार देखकर भी सीखते हैं।

यदि घर में महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा, भेदभाव या हिंसक व्यवहार को सामान्य माना जाता है, तो बच्चे भी गलत संदेश ग्रहण कर सकते हैं। इसलिए माता-पिता को स्वयं सम्मानजनक व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।

  • सम्मान की शिक्षा: बेटों और बेटियों दोनों को समान अधिकार और अवसर दें।
  • सहमति की समझ: बच्चों को बताएं कि किसी की व्यक्तिगत सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
  • डिजिटल अनुशासन: उम्र के अनुसार मोबाइल उपयोग और सामग्री की सीमाएं तय करें।
  • खुली बातचीत: बच्चों से उनकी जिज्ञासाओं और परेशानियों पर बिना डांटे चर्चा करें।
  • भावनात्मक शिक्षा: गुस्सा, अस्वीकृति और निराशा को स्वस्थ तरीके से संभालना सिखाएं।
  • गलत व्यवहार पर हस्तक्षेप: छेड़छाड़, धमकी या जबरदस्ती को बचपन की शरारत कहकर नजरअंदाज न करें।
  • सकारात्मक उदाहरण: पिता और परिवार के अन्य पुरुष सदस्य महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार करें।

बेटियां आखिर कहां सुरक्षित हैं?

बाल यौन हिंसा का खतरा केवल अनजान व्यक्तियों तक सीमित नहीं है। कई मामलों में आरोप ऐसे लोगों पर भी लगते हैं, जिन्हें बच्चा या उसका परिवार पहले से जानता है। इसलिए केवल अजनबियों से सावधान रहने की शिक्षा पर्याप्त नहीं है।

बच्चों को सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, शरीर की निजता तथा व्यक्तिगत सीमाओं के बारे में उम्र के अनुरूप समझाना चाहिए। उन्हें यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि यदि कोई व्यक्ति उन्हें असहज करे, डराए या किसी अनुचित व्यवहार को छिपाने के लिए कहे, तो वे तुरंत किसी विश्वसनीय वयस्क को बता सकते हैं।

यौन हिंसा की जिम्मेदारी हमेशा ऐसा कृत्य करने वाले व्यक्ति की होती है। पीड़ित बच्चे को कभी दोष नहीं दिया जाना चाहिए।

कानून क्या कहता है? हर अभिभावक को जानना जरूरी

भारत में बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने के लिए लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 अर्थात पॉक्सो अधिनियम लागू है। यह कानून 18 वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों को संरक्षण प्रदान करता है।

पॉक्सो अधिनियम की धारा 19 में यौन अपराध की जानकारी संबंधित अधिकारियों को देने का प्रावधान है। धारा 21 में रिपोर्टिंग से संबंधित कानूनी जिम्मेदारियों का पालन न करने पर दंड की व्यवस्था भी है।

यदि आरोपी भी नाबालिग है, तो किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत उसकी उम्र, अपराध की प्रकृति और अन्य कानूनी परिस्थितियों के अनुसार विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है।

पीड़ित बच्चे की पहचान गोपनीय रखना अत्यंत आवश्यक है। समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया पर उसका नाम, तस्वीर, पता, विद्यालय या पहचान उजागर करने वाली अन्य जानकारी प्रकाशित नहीं की जानी चाहिए।

बच्चे के साथ यौन हिंसा की आशंका हो तो क्या करें?

  • बच्चे को तत्काल सुरक्षित स्थान पर ले जाएं।
  • जरूरत पड़ने पर बिना देरी किए चिकित्सा सहायता लें।
  • स्थानीय पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को सूचना दें।
  • आपातकालीन सहायता के लिए 112 और चाइल्ड हेल्पलाइन के लिए 1098 पर संपर्क करें।
  • बच्चे की बात शांतिपूर्वक सुनें और उस पर घटना बार-बार बताने का दबाव न डालें।
  • संभावित साक्ष्य सुरक्षित रखें, लेकिन संवेदनशील सामग्री सोशल मीडिया पर साझा न करें।
  • आवश्यकतानुसार प्रशिक्षित बाल मनोवैज्ञानिक की सहायता लें।

अभिभावक रहें सतर्क: बच्चों के व्यवहार में इन बदलावों पर ध्यान दें

बच्चे के व्यवहार में अचानक भय, नींद में परेशानी, किसी विशेष व्यक्ति से मिलने में असहजता, सामाजिक अलगाव या असामान्य आक्रामकता जैसे बदलाव दिखाई दें तो उन्हें गंभीरता से समझने का प्रयास करें।

हालांकि ये संकेत अपने आप यौन हिंसा का प्रमाण नहीं हैं। इनके अनेक अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए बच्चे को दोष देने या उससे जबरन सवाल करने के बजाय संवेदनशील बातचीत और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सहायता का रास्ता अपनाना चाहिए।

स्कूलों और समाज की जिम्मेदारी भी तय हो

बाल सुरक्षा केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं है। स्कूलों में उम्र के अनुरूप शारीरिक सुरक्षा शिक्षा, डिजिटल साक्षरता, सहमति, लैंगिक समानता और शिकायत करने की सुरक्षित व्यवस्था होनी चाहिए।

विद्यालयों को शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए बाल संरक्षण प्रशिक्षण, स्पष्ट शिकायत प्रक्रिया और बच्चों की गोपनीयता सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।

समाज को भी पीड़ित बच्चे या परिवार को दोष देने के बजाय सहयोग, सुरक्षा और न्याय की प्रक्रिया में सहायता करनी चाहिए।

क्या स्मार्टफोन से बच्चों में आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ रही है?

बच्चों से जुड़े अपराधों की खबरें गंभीर चिंता पैदा करती हैं। लेकिन केवल ऐसी घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि स्मार्टफोन के कारण किशोर अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। अपराध के वास्तविक रुझान समझने के लिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के तुलनीय आंकड़ों, रिपोर्टिंग में बदलाव और वैज्ञानिक अध्ययनों का विश्लेषण आवश्यक है।

फिर भी बच्चों में दूसरों की सीमाओं का बार-बार उल्लंघन, हिंसक व्यवहार, ऑनलाइन उत्पीड़न या उम्र के अनुपयुक्त यौन व्यवहार को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। समय पर परामर्श और सकारात्मक मार्गदर्शन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

सवाल केवल मोबाइल का नहीं, हमारी परवरिश और प्राथमिकताओं का भी है

आज हम बच्चों को महंगे स्मार्टफोन देने में सक्षम हो रहे हैं, लेकिन क्या उनके साथ बैठकर उनकी परेशानियां सुनने के लिए पर्याप्त समय निकाल रहे हैं?

हम बेटियों को सावधान रहने की सलाह देते हैं, लेकिन क्या बेटों को महिलाओं की गरिमा और सहमति का सम्मान करना सिखाते हैं?

हम बच्चों को आधुनिक बनाना चाहते हैं, लेकिन क्या उन्हें संवेदनशील, जिम्मेदार और अच्छे नागरिक बनाने के लिए भी उतने ही प्रयास कर रहे हैं?

शुभदा शक्ति का संदेश: बचपन बचाइए, समाज का भविष्य बचाइए

बचपन को सुरक्षित बनाने के लिए तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदार उपयोग आवश्यक है। बच्चों को खेलकूद, रचनात्मक गतिविधियों, सकारात्मक पारिवारिक संवाद और सही मार्गदर्शन के अवसर देने होंगे।

बेटियों को भयमुक्त वातावरण और बेटों को सम्मान, समानता तथा जिम्मेदारी की शिक्षा देनी होगी। साथ ही कानून का प्रभावी क्रियान्वयन और पीड़ित बच्चों के प्रति संवेदनशील व्यवहार सुनिश्चित करना होगा।

बच्चों के हाथों में केवल स्मार्टफोन नहीं, संस्कार और संवेदनशीलता भी दीजिए। बेटियों को पाबंदियों में नहीं, सुरक्षा और सम्मान के वातावरण में जीने दीजिए।

क्योंकि जिस समाज में बचपन सुरक्षित नहीं, वहां विकास की हर उपलब्धि अधूरी है।

संपादकीय टिप्पणी: यह लेख सामाजिक जागरूकता एवं सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। देहरादून की घटना से संबंधित आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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