युग बदलते गए, पर संवेदना वहीं रही — क्या त्रेता, द्वापर और सतयुग में भी होते थे दिव्यांग?”

 

 

 

क्या दिव्यांगता सिर्फ आधुनिक युग की पहचान है, या फिर यह मानवीय अस्तित्व के साथ सदियों से जुड़ी हुई है? इस सवाल का जवाब हमें हमारे धार्मिक ग्रंथों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और पुरातात्विक खोजों में मिलता है।

 

पुराणों और महाकाव्यों में कई ऐसे पात्रों का उल्लेख मिलता है जो शारीरिक या मानसिक रूप से अलग थे, परंतु उन्हें समाज ने उनके गुणों के आधार पर मान्यता दी।

महाभारत के धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, फिर भी वे हस्तिनापुर के सम्राट बने।

रामायण में मंदोदरी, रावण की पत्नी, अपने पुत्र मेघनाद की मानसिक स्थिरता को लेकर चिंतित रहती है, जो संकेत करता है कि मानसिक असामान्यता तब भी समाज में समझी जाती थी।

 

उस काल में दिव्यांगता को कई बार ‘पिछले जन्म के कर्मों का फल’ या ‘देवी/दैवीय श्राप’ माना जाता था। इससे न केवल सामाजिक दूरी बनी, बल्कि ऐसे लोगों को उपचार या सहयोग से वंचित भी किया गया। फिर भी, कुछ मामलों में इन्हें विशेष आध्यात्मिक शक्तियों से युक्त समझा जाता था, और समाज ने उन्हें आश्रमों, तीर्थों या राजसभाओं में स्थान भी दिया।

 

पुरातत्व विशेषज्ञों को हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे स्थलों से ऐसे कंकाल मिले हैं जिनमें हड्डियों की विकृति या पोलियो जैसे संकेत पाए गए हैं। इसका मतलब यह है कि हजारों वर्ष पहले भी दिव्यांगता मौजूद थी, और संभवतः समाज का एक हिस्सा थी।

 

उस युग में चिकित्सा और विज्ञान का अभाव भले ही रहा हो, लेकिन करुणा, सहयोग और अध्यात्म ने इन विशेष व्यक्तियों को सम्मानजनक स्थान देने का प्रयास किया।

 

आज जब हम दिव्यांगता को ‘दोष’ नहीं, बल्कि ‘विशेषता’ के रूप में स्वीकार कर रहे हैं, तो यह जानना ज़रूरी है कि हमारी जड़ें भी इसी भावना से जुड़ी हुई हैं।

 

यह शोध न केवल ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि आज की समावेशी सोच और नीति निर्माण के लिए भी प्रेरक है।

SHUBHDA SHAKTI
Author: SHUBHDA SHAKTI

Leave a Comment

Toggle Dark Mode

Menu