
भगवान ने इस संसार को बनाया है। प्रकृति में भी कई विकृतियाँ हैं — गुलाब के फूल में कांटे होते हैं, कमल कीचड़ में खिलता है, फिर भी उनकी सुंदरता और महक कम नहीं होती। प्रकृति हमें सिखाती है कि किसी में कमी दिखे तो वह उसकी असली पहचान नहीं, बल्कि उसकी विशेषता हो सकती है।
फिर सवाल यह है कि दिव्यांग बच्चों को समाज क्यों अलग नज़र से देखता है?
इंसानों में भी अवगुण होते हैं, पर लोग उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं। अगर उनके पास पैसा हो तो उन्हें सम्मान भी मिल जाता है। लेकिन एक शांत स्वभाव के दिव्यांग बच्चे को, जो किसी का कुछ बिगाड़ता नहीं, अपनाने में समाज हिचकिचाता क्यों है?
देश में गिनी-चुनी संस्थाएँ ही हैं जो इन बच्चों को अपना मानकर उनकी देखभाल करती हैं। अजमेर की “शुभदा” संस्था ऐसी ही मिसाल है। यहाँ उन बच्चों को, जिनका कोई नहीं होता, परिवार का स्नेह और शिक्षा-संस्कार देकर जीवन की मुख्यधारा में लाने का प्रयास होता है। कहते हैं, “जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान होता है,” और शुभदा संस्था के ये लोग धरती पर भगवान के दूत की तरह इन बच्चों के लिए सोचते हैं, उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं।
जैसे हीरे को पहचानने वाला जौहरी ही उसकी कीमत जानता है, वैसे ही दिव्यांग बच्चों की मासूमियत और प्रतिभा को वही समझ सकता है जो संवेदनशील दिल रखता है। समाज को अपनी सोच की विकृति बदलनी होगी — क्योंकि कमी इंसान में नहीं, हमारी नज़र में है।
इन निस्वार्थ सेवकों का संदेश साफ है: दिव्यांग नहीं, ये बच्चे दिव्य आत्माएँ हैं। हमें इन्हें सहारा नहीं, बराबरी का सम्मान देना चाहिए।