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तानों को ताकत बनाया, जूडो मैट पर लिखी किस्मत: दृष्टिबाधित कोकिला ने एशियन पैरा गेम्स में जीता रजत

कभी शिक्षक ने दिव्यांगता को पिछले जन्म के कर्मों से जोड़ा था, आज अंतरराष्ट्रीय पदक जीतकर कोकिला कौशिक ने सामाजिक पूर्वाग्रहों को दिया करारा जवाब

शुभदा शक्ति न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट

कभी उनकी दृष्टिबाधिता को लेकर सवाल उठाए गए, कभी ताने सुनने पड़े और कभी दिव्यांगता को पिछले जन्म के कर्मों का परिणाम तक बताया गया। लेकिन हरियाणा की पैरा जूडो खिलाड़ी कोकिला कौशिक ने इन नकारात्मक टिप्पणियों को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उन्होंने मेहनत, आत्मविश्वास और परिवार के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई है।

जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन पैरा गेम्स 2026 में कोकिला ने महिलाओं की जे2-52 किलोग्राम जूडो स्पर्धा में रजत पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया। उनकी यह उपलब्धि केवल एक खेल पदक नहीं, बल्कि दिव्यांगता को कमजोरी मानने वाली सामाजिक मानसिकता के लिए भी एक सशक्त जवाब है।

विश्व चैंपियन को हराकर फाइनल में पहुंचीं

19 अक्टूबर को आयोजित प्रतियोगिता में कोकिला ने सेमीफाइनल में चीन की मौजूदा विश्व चैंपियन यी लियू को हराकर फाइनल में प्रवेश किया। हालांकि स्वर्ण पदक मुकाबले में किर्गिस्तान की आइबिके उलानबेक किजी ने उन्हें इप्पोन के जरिए पराजित कर दिया। इसके बावजूद कोकिला ने रजत पदक अपने नाम किया।

इससे पहले हांगझोऊ एशियन पैरा गेम्स में उन्होंने महिलाओं की 48 किलोग्राम श्रेणी में कांस्य पदक जीता था। इस बार 52 किलोग्राम श्रेणी में रजत पदक हासिल करना उनके खेल जीवन में महत्वपूर्ण प्रगति है।

जब शिक्षक ने दिव्यांगता को बताया पिछले जन्म के कर्मों का परिणाम

कोकिला की सफलता के पीछे सामाजिक पूर्वाग्रहों से संघर्ष की एक संवेदनशील कहानी भी है। उनके पिता कृष्ण कुमार कौशिक ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि एक साथी शिक्षक ने उनकी बेटी की दृष्टिबाधिता को पिछले जन्म के कर्मों से जोड़ दिया था।

ऐसी टिप्पणी किसी भी परिवार को आहत कर सकती है, लेकिन कृष्ण कुमार ने उस सोच को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपनी बेटी की क्षमताओं पर विश्वास बनाए रखा और उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। आज कोकिला की अंतरराष्ट्रीय सफलता ने साबित किया है कि किसी व्यक्ति की संभावनाएं उसकी दिव्यांगता से निर्धारित नहीं होतीं।

बचपन के तानों से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक

हरियाणा के जींद जिले से आने वाली कोकिला जन्म से दृष्टिबाधित हैं। बचपन में उन्हें स्कूल और आसपास के लोगों की नकारात्मक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। सात वर्ष की उम्र में परिवार को बताया गया था कि उनकी दृष्टि संबंधी समस्या का उपचार संभव नहीं है।

लेकिन परिवार ने उनकी शिक्षा, खेल और स्वतंत्र भविष्य की संभावनाओं को सीमित नहीं होने दिया। किशोरावस्था में जूडो का प्रशिक्षण शुरू करने के बाद कोकिला ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा दिखाई। आगे चलकर लखनऊ में प्रशिक्षक मुनव्वर अंजार अली सिद्दीकी के मार्गदर्शन में उन्होंने अपनी तकनीक और खेल कौशल को निखारा।

पेरिस पैरालंपिक से एशियाई पदक तक का सफर

कोकिला ने वर्ष 2024 के पेरिस पैरालंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रतिस्पर्धा करते हुए उन्होंने अपने प्रदर्शन में सुधार किया। हांगझोऊ का कांस्य और आइची-नागोया का रजत पदक उनकी मेहनत और निरंतर प्रगति के प्रमाण हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी उपलब्धि पर बधाई देते हुए कांस्य से रजत पदक तक की यात्रा को दृढ़ संकल्प, समर्पण और निरंतर प्रयास का उदाहरण बताया।

अब अगला लक्ष्य स्वर्ण पदक

रजत पदक जीतकर भारत लौटने के बाद कोकिला ने स्पष्ट किया कि उनका अगला लक्ष्य स्वर्ण पदक हासिल करना है। उन्होंने अपनी उपलब्धि पर खुशी जताई, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया कि वह स्वर्ण जीतना चाहती थीं। अब उनका ध्यान आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और वर्ष 2028 के पैरालंपिक की तैयारियों पर है।

दिव्यांगता नहीं, अवसरों की कमी बनती है बाधा

कोकिला की सफलता भारतीय समाज के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखती है। आखिर आज भी दिव्यांगता को कर्मों का फल, कमजोरी या किसी व्यक्ति की सीमित क्षमता का प्रमाण क्यों माना जाता है?

दिव्यांग व्यक्तियों को दया या सहानुभूति तक सीमित रखने के बजाय उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ खेल सुविधाएं, प्रशिक्षित मार्गदर्शन, समान अवसर और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना आवश्यक है।

विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांग बालिकाओं के लिए खेल प्रशिक्षण, आवागमन, संसाधनों और सामाजिक स्वीकार्यता की चुनौतियां अधिक गंभीर हो सकती हैं। ऐसे में परिवार, शिक्षकों, खेल संस्थानों और सरकार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

शुभदा शक्ति का संदेश: हर प्रतिभा को मिले सम्मान और अवसर

कोकिला कौशिक की उपलब्धि इस विचार को मजबूती देती है कि दिव्यांगजन समाज पर बोझ नहीं, बल्कि समाज की प्रतिभा, शक्ति और संभावनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। आवश्यकता उनकी क्षमताओं को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ने के लिए उचित अवसर प्रदान करने की है।

शुभदा शक्ति न्यूज़ का उद्देश्य भी दिव्यांगजनों की उपलब्धियों, अधिकारों, चुनौतियों और क्षमताओं को समाज के सामने लाना है, ताकि दिव्यांगता के प्रति बनी गलत धारणाओं को बदला जा सके।

कोकिला का रजत पदक केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि उस सोच पर विजय है जो दिव्यांगता को व्यक्ति की पहचान और भविष्य की सीमा मानती है।

शुभदा शक्ति न्यूज़ — दिव्यांगों को दुनिया और दुनिया को दिव्यांगों से जोड़ना।

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Author: sshakti

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