‘चंदू चैंपियन’ बनकर छाए कार्तिक आर्यन, जीता बेस्ट एक्टर नेशनल अवॉर्ड; राष्ट्रपति की तारीफ बनी यादगार

नई दिल्ली/अजमेर । बॉलीवुड अभिनेता कार्तिक आर्यन के करियर में एक और सुनहरा अध्याय जुड़ गया है। फिल्म ‘चंदू चैंपियन’ में शानदार अभिनय के लिए उन्हें 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (मुख्य भूमिका) के सम्मान से नवाजा गया। यह प्रतिष्ठित सम्मान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रदान किया। कार्तिक ने यह पुरस्कार मलयालम फिल्म ब्रमयुगम के अभिनेता ममूटी के साथ साझा किया।
‘चंदू चैंपियन’ ने दिलाया करियर का बड़ा सम्मान
कबीर खान निर्देशित चंदू चैंपियन में कार्तिक आर्यन ने भारत के पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता मुरलीकांत पेटकर की प्रेरक जीवन-यात्रा को पर्दे पर उतारा है। फिल्म में उनके संघर्ष, भारतीय सेना से जुड़ाव, युद्ध में घायल होने और इसके बाद खेलों के जरिए जिंदगी को नई दिशा देने की कहानी दिखाई गई है।

इस चुनौतीपूर्ण भूमिका के लिए कार्तिक आर्यन के शारीरिक बदलाव, मेहनत और अभिनय की काफी चर्चा हुई। अब राष्ट्रीय पुरस्कार ने उनके इस प्रदर्शन को देश के सर्वोच्च फिल्म सम्मानों में स्थान दिला दिया है।
कौन हैं असली ‘चंदू चैंपियन’ मुरलीकांत पेटकर?

मुरलीकांत राजाराम पेटकर का जन्म नवंबर 1944 में हुआ। महाराष्ट्र के ग्रामीण परिवेश से निकले पेटकर बचपन में कुश्ती से जुड़े और बाद में भारतीय सेना में शामिल हुए। सेना की ओर से उन्होंने बॉक्सिंग में भी हिस्सा लिया। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्हें कई गोलियां लगीं, जिससे उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। लेकिन गंभीर शारीरिक चोटें भी उनके हौसले को नहीं तोड़ सकीं।
इसके बाद पेटकर ने पैरा-स्पोर्ट्स को अपनी नई ताकत बनाया। 1972 के जर्मनी के हीडलबर्ग पैरालंपिक में उन्होंने पुरुषों की 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में 37.331 सेकंड का विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पदक जीता। इसी के साथ वह भारत के पहले पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट बने।

उनकी उपलब्धियां यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने 1970 के कॉमनवेल्थ पैराप्लेजिक गेम्स और 1982 के इंटरनेशनल FESPIC गेम्स में भी स्वर्ण पदक जीते। उन्हें 2018 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया और खेलों में उनके आजीवन योगदान के लिए अर्जुन अवॉर्ड (लाइफटाइम), 2024 भी प्रदान किया गया।
गोली लगी, शरीर ने साथ छोड़ा… लेकिन हौसला नहीं
मुरलीकांत पेटकर की जिंदगी चंदू चैंपियन की कहानी को और खास बनाती है। युद्ध में गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्होंने अपनी परिस्थितियों को कमजोरी नहीं बनने दिया। जिस व्यक्ति के सामने एक समय जिंदगी को दोबारा खड़ा करने की चुनौती थी, उसी ने आगे चलकर पैरालंपिक में भारत के लिए इतिहास रचा।
उनकी कहानी विशेष रूप से दिव्यांगजनों के लिए यह मजबूत संदेश देती है कि शारीरिक अक्षमता किसी व्यक्ति के सपनों, प्रतिभा और उपलब्धियों की सीमा तय नहीं करती।
राष्ट्रपति से सम्मान का पल बना यादगार
72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार ग्रहण करना कार्तिक आर्यन के लिए यादगार क्षण रहा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान राष्ट्रपति की ओर से उनके अभिनय की सराहना ने इस उपलब्धि को और खास बना दिया।
कार्तिक का यह सम्मान केवल एक अभिनेता की उपलब्धि नहीं है। इसके केंद्र में उस भारतीय सैनिक और पैरा-एथलीट मुरलीकांत पेटकर की असाधारण कहानी भी है, जिसने गोलियों से घायल होने के बाद जिंदगी की नई शुरुआत की और दुनिया के खेल मंच पर तिरंगा सबसे ऊपर पहुंचाया।
कार्तिक आर्यन ने पर्दे पर ‘चंदू चैंपियन’ को जीवंत किया, लेकिन इसके पीछे मौजूद असली चैंपियन मुरलीकांत पेटकर की जिंदगी आज भी यह संदेश देती है—हालात शरीर को रोक सकते हैं, हौसलों को नहीं।
शुभदा शक्ति | नि:शक्त की शक्ति
“दिव्यांगों को दुनिया और दुनिया को दिव्यांगों से जोड़ना।”





