Toggle Test

जी,सुना क्या ?? देवनानी का दावा और जयपाल का पलटवार बढ़ाएगा सियासी तापमान ।

वोट जनता ने दिया, ‘भाव’ निर्दलीयों के बढ़े! 37 वाली कांग्रेस या 32 वाली भाजपा—अजमेर की सत्ता किसके हाथ?

37 कांग्रेस, 32 भाजपा और 11 निर्दलीय; बहुमत के लिए 41 का आंकड़ा जरूरी—कांग्रेस को सिर्फ 4, भाजपा को 9 अतिरिक्त पार्षदों की जरूरत

अजमेर, 14 सितंबर। अजमेर नगर निगम चुनाव 2026 का जनादेश साफ भी है और अधूरा भी। साफ इसलिए कि मतदाताओं ने लंबे समय से नगर निगम की सत्ता पर काबिज भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया और कांग्रेस को 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बना दिया। अधूरा इसलिए कि 80 सदस्यीय निगम में बोर्ड बनाने के लिए जरूरी 41 पार्षदों का आंकड़ा किसी भी दल के पास नहीं है। भाजपा 32 सीटों पर सिमटी है, जबकि 11 निर्दलीय पार्षद जीतकर आए हैं। यानी अब अजमेर की नगर सरकार का रास्ता इन्हीं निर्दलीयों के समर्थन से होकर गुजरता है।

कांग्रेस के लिए रास्ता छोटा, भाजपा के लिए मुश्किल—लेकिन खेल खुला

संख्याबल को देखें तो कांग्रेस स्पष्ट रूप से बेहतर स्थिति में है। उसे बहुमत तक पहुंचने के लिए केवल चार और पार्षदों की जरूरत है। दूसरी ओर भाजपा को 41 तक पहुंचने के लिए नौ निर्दलीयों को अपने पक्ष में करना होगा। यही अंतर कांग्रेस को बोर्ड गठन की दौड़ में शुरुआती बढ़त देता है।

लेकिन स्थानीय निकाय की राजनीति केवल अंकगणित नहीं होती। निर्दलीयों में कई ऐसे चेहरे होते हैं जिनका किसी न किसी दल से पुराना राजनीतिक संबंध, स्थानीय समीकरण या टिकट कटने के बाद बगावत का इतिहास रहा है। चुनाव से पहले ही दोनों प्रमुख दलों के बागी उम्मीदवारों को महत्वपूर्ण फैक्टर माना जा रहा था।

इसलिए 37+4=41 कांग्रेस का सबसे आसान फॉर्मूला है। वहीं भाजपा के लिए 32+9=41 का रास्ता अपेक्षाकृत कठिन है। भाजपा यदि बोर्ड बनाना चाहती है तो उसे लगभग पूरे निर्दलीय समूह को एक साथ साधना होगा।

कांग्रेस का दावा मजबूत, पर 41 का आंकड़ा ही असली परीक्षा

कांग्रेस खेमे ने परिणाम के बाद बोर्ड बनाने का दावा शुरू कर दिया है। मीडिया रिपोर्टों में पार्टी नेताओं की ओर से यह भी दावा किया गया है कि 11 निर्दलीयों में से अधिकांश कांग्रेस के संपर्क या समर्थन में हैं।

यदि कांग्रेस चार निर्दलीयों का पक्का समर्थन हासिल कर लेती है तो उसका बोर्ड बनने का रास्ता लगभग सीधा हो जाएगा। राजनीतिक स्थिरता के लिहाज से पार्टी केवल चार पर रुकने के बजाय ज्यादा निर्दलीयों को साथ लेने की कोशिश कर सकती है, ताकि बहुमत बहुत मामूली न रहे।

भाजपा के पास क्या विकल्प?

32 सीटों के बावजूद भाजपा को दौड़ से बाहर मानना जल्दबाजी होगी। अजमेर में उसका मजबूत संगठन और लंबा नगर निकाय अनुभव उसकी ताकत है। लेकिन संख्या उसके खिलाफ है।

भाजपा की पहली रणनीति स्वाभाविक रूप से उन निर्दलीयों से संपर्क की हो सकती है जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि भाजपा या उसके स्थानीय नेताओं से जुड़ी रही हो। चुनाव में भाजपा के बागी भी निर्दलीय के रूप में मैदान में थे और कुछ ने जीत भी दर्ज की है।

फिर भी नौ निर्दलीयों को एक साथ अपने पक्ष में लाना आसान नहीं होगा। यदि कांग्रेस अपने 37 पार्षदों को एकजुट रखती है और चार या उससे अधिक निर्दलीयों का समर्थन हासिल कर लेती है, तो भाजपा के लिए सत्ता का गणित बेहद कठिन हो जाएगा।

देवनानी का दावा और जयपाल का पलटवार बढ़ाएगा सियासी तापमान

चुनाव परिणाम के साथ ही बयानबाजी भी तेज हो गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अजमेर उत्तर विधायक और विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की ओर से भाजपा के बोर्ड और मेयर को लेकर दावा किया गया है। दूसरी तरफ शहर कांग्रेस जिलाध्यक्ष डॉ. राजकुमार जयपाल ने पलटवार करते हुए कांग्रेस का बोर्ड बनने का भरोसा जताया है।

ऐसे दावे इस बात का संकेत हैं कि पार्षद चुनाव खत्म हुआ है, लेकिन असली राजनीतिक मुकाबला अब बोर्ड गठन को लेकर शुरू हुआ है।

दिग्गजों के वार्डों के नतीजों में भी छिपा संदेश

इन चुनावों का एक दिलचस्प पहलू यह है कि शहर के प्रमुख नेताओं से जुड़े वार्डों में भाजपा और कांग्रेस दोनों को सफलताएं मिली हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अजमेर का जनादेश पूरी तरह किसी एक राजनीतिक ध्रुव की ओर नहीं गया।

चुनाव पूर्व परिस्थितियों में भी स्थानीय मुद्दे—सड़क, पानी, नालियां, आनासागर और शहरी व्यवस्थाएं—प्रमुखता से उठे थे। कांग्रेस ने इन्हीं मुद्दों को भाजपा के लंबे नगर निकाय शासन के खिलाफ अपने अभियान का हिस्सा बनाया था।

मेयर पद महिला के लिए आरक्षित, इसलिए दूसरा बड़ा मुकाबला चेहरे का

इस बार अजमेर का महापौर पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित है। इसका मतलब है कि बोर्ड का बहुमत जुटाने के साथ भाजपा और कांग्रेस को ऐसा महिला चेहरा भी सामने लाना होगा जो पार्टी के भीतर स्वीकार्य होने के साथ सहयोगी निर्दलीयों को भी स्वीकार्य हो।

यहीं चुनाव का दूसरा राजनीतिक समीकरण शुरू होता है। यदि समर्थन देने वाले निर्दलीय मेयर उम्मीदवार को लेकर अपनी पसंद या शर्त रखते हैं तो दोनों दलों को केवल संख्या ही नहीं, चेहरे पर सहमति भी बनानी पड़ेगी।

एक्सपर्ट व्यू: कांग्रेस 60:40 से आगे, मगर निर्दलीय बदल सकते हैं तस्वीर

मौजूदा संख्याबल के आधार पर राजनीतिक आकलन किया जाए तो कांग्रेस बोर्ड बनाने की स्वाभाविक फ्रंट रनर है। 37 सीटों से 41 तक पहुंचने का फासला बहुत छोटा है। भाजपा को नौ निर्दलीयों की जरूरत होने के कारण उसका रास्ता ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।

इसे मोटे राजनीतिक आकलन में कांग्रेस के पक्ष में 60:40 की शुरुआती स्थिति कहा जा सकता है—यह कोई आधिकारिक संभावना या सर्वे नहीं, बल्कि उपलब्ध संख्याबल पर आधारित विश्लेषण है। यदि कांग्रेस चार से छह निर्दलीयों का समर्थन सार्वजनिक रूप से सुनिश्चित कर देती है तो यह बढ़त निर्णायक हो सकती है। इसके उलट यदि निर्दलीयों का बड़ा समूह भाजपा के साथ जाता है या कांग्रेस के भीतर असंतोष पैदा होता है, तभी भाजपा की वापसी का रास्ता खुल सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अजमेर की जनता ने किसी दल को अकेले सत्ता नहीं सौंपी है। कांग्रेस को सबसे बड़ी पार्टी बनाया है, भाजपा को मजबूत विपक्षी संख्या दी है और 11 निर्दलीयों को सत्ता की चाबी। अब सवाल यह नहीं कि चुनाव कौन जीता—असली सवाल है कि इन 11 चाबियों में से कम से कम चार कांग्रेस हासिल करती है या नौ भाजपा। आने वाले दिनों में अजमेर की राजनीति इसी अंकगणित के इर्द-गिर्द घूमेगी।

शुभदा शक्ति न्यूज़ | नि:शक्त की शक्ति

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

Leave a Comment