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जी, सुना क्या?? पर्युषण पर्व क्यों मनाया जाता है? जानिए जैन धर्म में इसका महत्व, संवत्सरी, दशलक्षण और मिच्छामि दुक्कडम् का अर्थ

पर्युषण पर्व: उत्सव नहीं, आत्मा की शुद्धि का महापर्व; जानिए जैन धर्म में क्यों है इसका इतना महत्व

 

 

शुभदा शक्ति | धर्म एवं संस्कृति

जैन धर्म में पर्व केवल उत्सव और उल्लास का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम भी हैं। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण है पर्युषण पर्व, जिसे जैन समाज का सबसे पवित्र आध्यात्मिक पर्व माना जाता है। यह पर्व व्यक्ति को संसार की भागदौड़ से कुछ समय निकालकर स्वयं के भीतर झांकने, अपनी गलतियों को पहचानने और क्षमा, अहिंसा, संयम तथा तप के रास्ते पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

आखिर क्या है ‘पर्युषण’ का अर्थ?

‘पर्युषण’ की मूल भावना अपने भीतर ठहरने और आत्मा के निकट जाने से जुड़ी है। सरल शब्दों में कहें तो यह पर्व दूसरों की कमियां खोजने के बजाय अपने स्वयं के व्यवहार और कर्मों का हिसाब करने का अवसर देता है।

जैन दर्शन में क्रोध, मान, माया और लोभ को आत्मिक उन्नति में बाधक माना गया है। पर्युषण के दिनों में इन्हीं विकारों को कम करने और अहिंसा, सत्य, संयम तथा अपरिग्रह जैसे सिद्धांतों को जीवन में उतारने का प्रयास किया जाता है।

श्वेतांबर में 8 दिन, दिगंबर परंपरा में दशलक्षण

जैन धर्म की प्रमुख परंपराओं में पर्व मनाने की अवधि और धार्मिक विधियों में कुछ अंतर है। श्वेतांबर जैन परंपरा में पर्युषण सामान्यतः आठ दिनों तक मनाया जाता है और इसका समापन संवत्सरी के साथ होता है।

वहीं दिगंबर जैन परंपरा में दस दिनों का दशलक्षण महापर्व मनाया जाता है। इसमें धर्म के दस गुणों—उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य—की आराधना की जाती है।

उपवास ही नहीं, मन पर नियंत्रण भी है तप

पर्युषण के दौरान जैन समाज में तप और उपवास का विशेष महत्व रहता है। श्रद्धालु अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार उपवास, एकासन, बियासन और आयंबिल सहित विभिन्न प्रकार की तपस्याएं करते हैं। कुछ साधक लगातार कई दिनों तक उपवास भी रखते हैं।

लेकिन जैन दर्शन में तप का अर्थ केवल भोजन छोड़ना नहीं है। क्रोध पर नियंत्रण, वाणी में संयम, इच्छाओं को सीमित करना और किसी जीव को कष्ट न पहुंचाने का प्रयास भी तप की भावना का हिस्सा है।

इन दिनों धार्मिक प्रवचन सुनने, स्वाध्याय, सामायिक और प्रतिक्रमण का भी विशेष महत्व है। प्रतिक्रमण के माध्यम से व्यक्ति अपने द्वारा जाने-अनजाने में किए गए अनुचित कार्यों का चिंतन करता है, प्रायश्चित करता है और उन्हें दोबारा न दोहराने का संकल्प लेता है।

‘मिच्छामि दुक्कडम्’—कुछ शब्दों में छिपा क्षमा का विशाल संदेश

पर्युषण का सबसे सुंदर और भावनात्मक पक्ष है क्षमा। श्वेतांबर परंपरा में संवत्सरी के अवसर पर लोग एक-दूसरे से मन, वचन या कर्म से हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं और कहते हैं—“मिच्छामि दुक्कडम्।”

इसका भाव है कि मेरे कारण आपको जाने-अनजाने किसी प्रकार का दुख पहुंचा हो तो मुझे क्षमा करें।

दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण पर्व के बाद क्षमावाणी मनाई जाती है। यहां भी संदेश यही है कि व्यक्ति अहंकार और वैर को छोड़कर दूसरों से क्षमा मांगे और स्वयं भी दूसरों को हृदय से क्षमा करे।

कल्पसूत्र और भगवान महावीर की शिक्षाएं

श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण के दौरान कल्पसूत्र के वाचन का विशेष धार्मिक महत्व है। इसमें जैन तीर्थंकरों, विशेष रूप से भगवान महावीर के जीवन से जुड़े प्रसंगों का वर्णन मिलता है।

पर्युषण की मूल भावना भी भगवान महावीर की शिक्षाओं—अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, संयम और आत्मकल्याण—से गहराई से जुड़ी हुई है। जैन दर्शन जीव मात्र के प्रति करुणा का संदेश देता है। यही कारण है कि पर्युषण के दौरान खान-पान और दिनचर्या में भी विशेष सावधानी एवं संयम बरता जाता है।

आज के दौर में और भी प्रासंगिक है पर्युषण का संदेश

तनाव, प्रतिस्पर्धा, क्रोध और आपसी मतभेदों से भरे वर्तमान समय में पर्युषण का संदेश केवल जैन समाज तक सीमित नहीं दिखाई देता। अपनी गलती स्वीकार करना, क्षमा मांगना, दूसरों को क्षमा करना, जरूरतों को सीमित रखना और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा रखना—ये ऐसे मूल्य हैं जिन्हें हर व्यक्ति अपने जीवन में अपना सकता है।

पर्युषण हमें याद दिलाता है कि असली विजय किसी दूसरे व्यक्ति पर नहीं, बल्कि अपने क्रोध, अहंकार, लोभ और इच्छाओं पर विजय पाने में है।

यही कारण है कि पर्युषण को केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, आत्मनिरीक्षण और क्षमा का महापर्व कहा जाता है।

संदेश एक ही है—भूल हुई है तो क्षमा मांगें, किसी ने भूल की है तो उसे क्षमा करें और जीवन को अहिंसा, करुणा व संयम की ओर ले जाएं।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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