Toggle Test

हर साल 2,600 घंटे गर्मी का खतरा ।

जलवायु परिवर्तन का जानलेवा असर: गर्मी से मौतों में 36% बढ़ोतरी, भारत में सालाना 2,600 घंटे स्वास्थ्य पर खतरा।

लैंसेट काउंटडाउन 2026 की रिपोर्ट में चेतावनी, रात की गर्मी से भारतीयों की औसतन 64 घंटे की नींद प्रभावित।

शुभदा शक्ति न्यूज़ | 28 अक्टूबर 2026। जलवायु परिवर्तन अब केवल बढ़ते तापमान और बदलते मौसम का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि दुनिया के सामने गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभर रहा है। लैंसेट काउंटडाउन की 2026 रिपोर्ट में प्रस्तुत अनुमानों के अनुसार, पेरिस जलवायु समझौते के बाद के दशक में गर्मी से संबंधित मौतों की वैश्विक वार्षिक औसत संख्या लगभग 36 प्रतिशत बढ़ी है। भारत में भी अत्यधिक गर्मी के कारण स्वास्थ्य, नींद और कामकाजी परिस्थितियों पर बढ़ते दबाव की चेतावनी दी गई है।

28 अक्टूबर को जारी बताई गई इस रिपोर्ट में 71 संस्थानों के 146 विशेषज्ञों के योगदान का उल्लेख है। रिपोर्ट स्वास्थ्य सेवाओं और जलवायु नीतियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर देती है।

भारत में सालाना 2,600 घंटे से अधिक गर्मी का स्वास्थ्य जोखिम

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016 से 2025 के बीच भारत में लोगों को प्रतिवर्ष औसतन 2,600 घंटे से अधिक ऐसी गर्म परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जिनमें सामान्य बाहरी शारीरिक गतिविधियों के दौरान भी स्वास्थ्य पर मध्यम या उससे अधिक जोखिम हो सकता था। यह आंकड़ा 1990 के दशक के वार्षिक औसत से 200 घंटे से अधिक बताया गया है।

यह अवधि पूरे देश में हर व्यक्ति के वास्तविक गर्मी-संपर्क का माप नहीं, बल्कि निर्धारित तापीय परिस्थितियों के आधार पर तैयार जोखिम संकेतक है।

रात की गर्मी छीन रही सुकून की नींद

रिपोर्ट के अनुमानों के मुताबिक, 2021 से 2025 के दौरान रात के अधिक तापमान के कारण भारत में प्रतिवर्ष औसतन 64 घंटे की नींद प्रभावित हुई। यह 1986 से 2005 की आधार अवधि के औसत से लगभग तीन घंटे अधिक बताया गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार गर्म रातें शरीर को दिनभर की गर्मी से उबरने का पर्याप्त अवसर नहीं देतीं। नींद की कमी से थकान, एकाग्रता में गिरावट और पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ने की आशंका रहती है।

2023 में गर्मी से जुड़ी 7.1 लाख मौतों का अनुमान

उपलब्ध रिपोर्ट विवरण के अनुसार, 2016 से 2023 के बीच गर्मी से संबंधित मौतों का वैश्विक वार्षिक औसत लगभग 5.4 लाख रहा, जबकि 2023 में यह अनुमान बढ़कर 7.1 लाख तक पहुंच गया। अध्ययन में 2023 की गर्मी से जुड़ी मौतों के 70 प्रतिशत से अधिक हिस्से का संबंध मानवजनित जलवायु परिवर्तन से होने का अनुमान भी व्यक्त किया गया है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि ये वैज्ञानिक मॉडल पर आधारित अनुमान हैं, न कि सभी देशों में मृत्यु प्रमाणपत्रों पर दर्ज मौतों की प्रत्यक्ष गणना।

बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगजनों और श्रमिकों के लिए विशेष चिंता

अत्यधिक गर्मी से निर्जलीकरण, हीट एग्जॉशन और हीटस्ट्रोक जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। हृदय और श्वसन संबंधी बीमारियों वाले व्यक्तियों के लिए भी खतरा बढ़ सकता है। निर्माण श्रमिक, किसान, डिलीवरी कर्मचारी, छोटे बच्चे और बुजुर्ग विशेष रूप से संवेदनशील समूहों में शामिल हैं।

कुछ दिव्यांगजनों के लिए तापमान नियंत्रण में कठिनाई, सीमित गतिशीलता, संचार संबंधी बाधाएं या सुलभ शीतलन सुविधाओं का अभाव अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए गर्मी से बचाव की योजनाओं में उनकी जरूरतों को शामिल करना आवश्यक है।

समाधान के लिए क्या कदम जरूरी?

बढ़ती गर्मी से बचाव के लिए शहरों में पेड़ और छायादार स्थान बढ़ाने, सार्वजनिक पेयजल उपलब्ध कराने, सुलभ शीतलन केंद्र विकसित करने, समय पर हीटवेव चेतावनी देने और बाहरी श्रमिकों के लिए सुरक्षित कार्य समय निर्धारित करने जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं।

जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति में उत्सर्जन घटाने के साथ-साथ स्वास्थ्य सुरक्षा, स्थानीय प्रशासन की तैयारी और संवेदनशील समुदायों तक सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

शुभदा शक्ति न्यूज़ का संदेश: बढ़ती गर्मी केवल पर्यावरण का सवाल नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, आजीविका और समान अवसरों से जुड़ी चुनौती है। जलवायु सुरक्षा की योजनाएं तभी प्रभावी होंगी, जब समाज के सबसे संवेदनशील लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता मिलेगी।

संपादकीय नोट: रिपोर्ट के वर्ष, संस्थानों की संख्या और सांख्यिकीय दावों का मूल प्रकाशन से स्वतंत्र सत्यापन प्रकाशन से पहले आवश्यक है।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

Leave a Comment