Trending Story
Advertisement

शौचालयों तक पहुंचने में दिक्कत होने से दिव्यांग लोगों के दैनिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव होता है.

दिव्यांग व्यक्तियों के लिए मानसून में पहुँच योग्य शौचालय

शौचालयों तक पहुंचने में दिक्कत होने से दिव्यांग लोगों के दैनिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव होता है, जो उनकी साफ़-सफाई, स्वास्थ्य, सुविधा, निजता और गरिमा को प्रभावित करता है.

मानसून उन समयों में से एक है जब हर टाइल युक्त सतह एक बढ़ा में, या एक फिसलन भरी चुनौती में बदल जाती है. यहाँ तक कि जब हम गीले मौसम की जूते पहन रहे होते हैं, और जब हमारे पास एक सक्षम शरीर होने का विशेषाधिकार हो, तब भी यह भयावह होता है. दिव्यांग लोगों के लिए मानसून हमारे द्वारा निर्मित वातावरण में आवागमन में ही बहुत सी अनकही चुनौतियाँ लेकर आता है.
शौचालय ऐसे हों कि दिव्यांग भी वहां आसानी से पुहंच पाएं.
दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सबसे अधिक पहुँच से बाहर क्षेत्रों में से एक शौचालय है. ये जगहें प्रायः इतनी संकरी होती हैं कि उसमें आसानी से आना-जाना नहीं हो पाता, स्टाल इतने चौड़े नहीं होते कि व्हीलचेयर आ सके, पर्याप्त ग्रैब बार नहीं होते… और यहाँ तक कि मानसून से पहले ही फर्श एक गीले, फिसलन भरे जोखिम में तब्दील हो जाती है.

मानसून के समय में दिव्यांग लोगों के सामने चुनौतियाँ
हम में से बचे हुए लोगों की तरह, दिव्यांग व्यक्ति मानसून के मौसम में बहुत सी चुनौतियों का सामना करते हैं, जैसे तेज़ बारिश, बाढ़, भूस्खलन और बिजली की कटौती. फिर, ये उनकी आवाजाही, स्वास्थ्य और सुरक्षा को बहुत अधिक प्रभावित कर सकती हैं. और फिर एक ऐसे शौचालय का प्रयोग करने का अपमान (और असुविधा) जिसमें उनके हिसाब से उपकरण न हों. कल्पना करिए कि आपको रेस्क्यू करने वाले घण्टों ड्राइव करके आपको एक ‘सुरक्षित’ स्थान पर ले जाते हैं, जहाँ आपको ऐसा शौचालय मिलाता है जो आपके लिए पहुँच योग्य ना हो. यह बहुतों के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता है. यहाँ तक कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में भी, दिव्यांग व्यक्ति ख़राब तरीके से निर्मित किये गए शौचालयों से जूझते हैं, जो मानसून के समय बहुत खतरनाक हो जाते हैं:

वे अक्सर मुख्य ईमारतों या रास्तों से दूर होते हैं, जिससे उन तक पहुँचना मुश्किल होता है.
● उनकी निर्माण और मरम्मत ख़राब ढंग से होता है, जिससे रिसाव, जमाव, ओवरफ्लो और दुर्गन्ध आती है.
● उनमें उचित वायुप्रवाह नहीं होता, जिससे काई, फंफूद और कीड़े पनपते है.
● उनके फर्श और सीढ़ियों में फिसलन होती है, जिससे गिराने और घायल होने का जोखिम बढ़ जाता है.
● उनके दरवाजे और स्टाल संकरे होते है, व्हीलचेयर या क्रच वाले लोगों को अन्दर आने या संचालन से रोकते हैं.
● उनमें ग़लत ढंग के या अनुचित फिक्सचर होते हैं, जैसे नीची या ऊँची सीट, टूटी या गायब हैण्डरेल और पहुँच से बाहर सिंक और शीशे.
इन मामलों का दिव्यांग लोगों के दैनिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव होता है, जो उनकी साफ़-सफाई, स्वास्थ्य, सुविधा, निजता और गरिमा को प्रभावित करता है.

मानसून-रोधी पहुँच योग्य शौचालयों की डिजाईन सम्बन्धी ध्यान देने योग्य बातें
मानसून-रोधी शौचालय वे होते हैं जो मानसून के मौसम की कठोर मौसमी परिस्थितियों के सामने अपनी क्रियाशीलता या गुणवत्ता के प्रभावित हुए बिना टिक सकते हैं. हालाँकि, हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता होती है कि ये शौचालय सभी उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध हों, जिसका अर्थ है कि अलग-अलग प्रकार की दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए उन तक पहुंचना, प्रयोग करना और बाहर आना आसान हो. मानसून-रोधी शौचालयों की डिजाईन के सम्बन्ध में कुछ ध्यान देने योग्य बातें:
● सार्वभौमिक डिजाईन के सिद्धान्त शामिल हों: सार्वभौमिक डिजाईन एक अवधारणा है जो ऐसे उत्पाद और वातावरण के निर्माण पर केन्द्रित होती है जिसे सभी लोग प्रयोग कर सकें, चाहे उनकी क्षमता या पसंद जो भी हो.
● मानसून की परिस्थितियों के हिसाब से जल-रोधन और जल-निकासी प्रणाली: जलरोधी सामग्रियां, ऊँचा ताल, ढालयुक्त छतें, गटर, पाइपें, पंप, वाल्व और फ़िल्टर मानसून के मौसम में शौचालय के अन्दर जल के नुक्सान और बाढ़ से बचाव में मदद कर सकते हैं.
● नमी-सम्बन्धी समस्याओं से बचाव के लिए उचित वायु प्रवाह: यह उष्णता के स्तर को कम करने, फंफूद की वृद्धि को रोकने, गन्ध को दूर करने और वायु की गुणवत्ता को बढ़ाने में मदद कर सकता है.
● बढ़ी हुई सुरक्षा के लिए फिसलन-मुक्त फर्श और हैण्डरेल: वे ऐसी सामग्री से बनी होनी चाहिए जो कर्षण (ट्रैक्शन) प्रदान करता हो, जैसे रबर या टेक्सचर युक्त टाइल्स. हैण्डरेल को दीवारों, सीढ़ियों और रैम्प पर लगाना चाहिए और इन्हें टिकाऊ, सहज और पकड़ने में आसान होना चाहिए.
● पहुँच और प्रयोग के लिए पर्याप्त जगह: फिक्सचर, दरवाजों और दीवारों के बीच, साथ ही स्टाल के अन्दर पर्याप्त जगह होनी चाहिए, ताकि व्हीलचेयर या क्रच प्रयोग करने वाले लोग आ सकें. पहुँच योग्य टॉयलेट स्टाल का न्यूनतम आकर 150 सेमी x150 सेमी होना चाहिए.

जागरूकता और हिमायत को बढ़ावा देना
हममें से बहुतों के लिए, यह एक ब्लाइंडस्पॉट होता है. हमारे पास सक्षम-शरीर वाला होने का विशेषाधिकार है, और इसलिए, हम ऐसी परिस्थितियों का सामना नहीं करते (या यहाँ तक कि उनके बारे में सोचते तक नहीं) जब तक कि हमारे हाथ में फ्रैक्चर ना हो, टांग न टूट जाए, या हमें किसी ऐसे दोस्त या परिवार के सदस्य की सहायता करनी पड़े जो इससे गुजर रहा हो. इसीलिए जनता को शिक्षित करना दिव्यांग लोगों के लिए समावेशी शौचालयों के महत्त्व के बारे में लोगों को तैयार करने की दिशा में पहला क़दम है.

SHUBHDA SHAKTI
Author: SHUBHDA SHAKTI

Leave a Comment

Advertisement
Trending Story
Toggle Dark Mode

Menu