Trending Story
Advertisement

बच्चों में मानसिक चुनौतियां बढ़ रही हैं और अभिभावकों से इसका उपचार कराने को कहने पर वो भड़क जाते हैं।

Mental Health Disorders: बच्चों में बढ़ रही मानसिक दिव्यांगता, ये आंकड़े आपको कर देंगे परेशान

अभिभावकों से इसका उपचार कराने को कहने पर वो भड़क जाते हैं। उनका तर्क होता है कि जब हम छोटे थे तो हमने भी देर से बोलना शुरू किया था या फलां का बच्चा इतने समय तक चल या बोल नहीं पाता था।

बच्चों में मानसिक चुनौतियां बढ़ रही हैं। यह हम नहीं बल्कि आंकड़े बता रहे हैं। 2011 की जनगणना को ही देखा जाए तो देश में इसके शिकार बच्चों की संख्या चिंताजनक है।

इसे रोकने को निरंतर जागरुकता और समय पर चिकित्सकीय पहल आवश्यक है। इस समस्या से निपटने के लिए मनोचिकित्सक और मानसिक परामर्श की कमी देखी जा रही है।

बच्चों की मानसिक समस्याओं के विशेषज्ञ पीएमसीएच में एसोसिएट प्रोफेसर रहे डॉ. सच्चिदानंद सिंह ने बताया कि ज्यादातर बच्चों को पांच-छः वर्ष के बाद इलाज के लिए लाया जाता है।

कुछ अभिभावक मनोचिकित्सक, न्यूरोलॉजिस्ट, पीडियॉट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट, शिशु रोग विशेषज्ञ तो कुछ गूगल की मदद से ऑटिज्म मानकर उसके उपचार के लिए स्थापित विशेष केंद्रों में जाते हैं। यही कारण है कि मानसिक दिव्यांगता से पीड़ित बच्चों की सही संख्या मौजूद नहीं है।

दूसरों पर निर्भर रहती है जिंदगी

इसके अभाव में सरकार इनके पुनर्वास की पुख्ता व्यवस्था नहीं कर पाती है। इनके वास्तविक आंकड़े पता करना जरूरी है। जो चिह्नित किए जा रहे हैं, संख्या उससे अधिक है। चलने-फिरने, कम दिखने, कम सुनने, मूक-बधिर होने के बजाय मानसिक अक्षमता व्यक्ति को जीवन भर के लिए दूसरों पर निर्भर कर देती है।

ऐसे लोग अपने रोजमर्रा के कामों जैसे कपड़े पहनने, बाथरूम या ब्रश करने, अपने निर्णय लेने समेत तमाम कामों के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में अभिभावकों के नहीं रहने पर उनका जीवन नर्क समान हो जाता है। यह गंभीर समस्या है, जिस पर ध्यान देना होगा।

नवजात बच्चों के विशेषज्ञ डॉक्टरों के संगठन नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम (एनएनएफ) के प्रदेश सचिव डॉ. श्रवण कुमार के अनुसार कई बार शिशु को देखकर मानसिक अक्षमता का आभास होता है। अभिभावकों से इसका उपचार कराने को कहने पर वो भड़क जाते हैं।

उनका तर्क होता है कि जब हम छोटे थे तो हमने भी देर से बोलना शुरू किया था या फलां का बच्चा इतने समय तक चल या बोल नहीं पाता था, पर आज बिल्कुल सामान्य है। ऐसे में कई बार इलाज में देरी होने से बच्चा दिव्यांगता की ओर बढ़ जाता है। अगर तीन वर्ष की उम्र से ही समस्या दूर करने के लिए सही थेरेपी दी जाए तो वह सामान्य हो सकता है।

सरकार ने की पुनर्वास की पहल :

सरकार के निर्देश पर चार विभाग मिलकर 0 से 18 आयु वर्ग के दिव्यांगों की पहचान और उनके पुनर्वास के लिए अभियान चला रहे हैं।

बिहार शिक्षा परियोजना के सर्वे से इतर बहुत से दिव्यांग सामने आ रहे हैं। 21 प्रकार की निशक्तता में बौद्धिक अक्षमता, स्पेसिफिक लर्निंग डिसेबिलिटी, ऑटिज्म और मस्तिष्क संबंधी रोग जैसे सेरेब्रल पाल्सी, मेंटल इलनेस, पार्किंसन और क्रॉनिक न्यूरोलाजिकल कंडीशन जिनसे मानसिक अक्षमता की आशंका बढ़ती है, को भी चिह्नित किया जा रहा है।

एम्स के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज सिंह, नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. एके जायसवाल व डॉ. एनपी नारायण मानसिक समस्याओं से पीड़ित बच्चों के उपचार की व्यवस्था में भारी कमी बता रहे हैं।

इसका कारण प्रदेश में मनोचिकित्सकों, मानसिक परामर्शी, कुशल नर्सों व चिकित्साकर्मियों और इलाज केंद्रों की कम संख्या को बताया जाता है।

बौद्धिक अक्षमता से पीड़ित बच्चों का समाज में हाल :

  • बौद्धिक अक्षमता से पीड़ित 57.7 प्रतिशत बच्चे परिवार पर आश्रित
  • 2.1 प्रतिशत को ही मिल रहा सरकारी योजनाओं का फायदा
  • 0.5 प्रतिशत भीख मांग कर रहे जीवन यापन
  • 9.6 प्रतिशत को लोगों ने घरेलू कार्यों में लगा रखा है
  • 24.5 प्रतिशत बच्चे ही स्कूल जा रहे हैं
  • 5.6 दूसरे माध्यमों से कर रहे जीवनयापन

मेंटल इलनेस से पीड़ित बच्चों का सामाजिक परिदृश्य

  • मानसिक रोग से पीड़ित 66.6 प्रतिशत बच्चे परिवार पर निर्भर
  • 11.9 प्रतिशत घरों में काम कर जीवनयापन को मजबूर
  • 2.8 प्रतिशत को ही मिल रही सरकारी योजना का लाभ
  • 9.3 प्रतिशत बच्चे ही स्कूल जा रहे
  • 8.4 प्रतिशत दूसरे माध्यमों से गुजार रहे अपना जीवन
SHUBHDA SHAKTI
Author: SHUBHDA SHAKTI

Leave a Comment

Advertisement
Trending Story
Toggle Dark Mode

Menu