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बचपन में खोई आंख, पैरालंपिक तक पहुंचने जमींदारों के खेतों में किया काम, अब बनाएंगे महल

पैरालिंपिक मेडल विजेता कपिल के संघर्ष की कहानी:
आंखों की 80% रोशनी खोई तो लोग सूरदास बोलने लगे; मां ने हिम्मत दी तो ठान लिया- मेडल से जवाब दूंगा

मध्य प्रदेश के सीहोर के रहने वाले कपिल परमार ने देश को जूडो में पहला पैरालिंपिक मेडल दिलाया। हालांकि, उनके लिए पेरिस पैरालिंपिक के मंच तक पहुंचना आसान नहीं था। 12 साल पहले करंट लगने से उनकी आंखों की 80% रोशनी चली गई। लोग उन्हें सूरदास कहकर ताने मारने लगे, तब उनके मन में आत्महत्या करने तक का ख्याल आया। लेकिन, कपिल ने हार मानने की बजाय ठान लिया कि वह अपने आलोचकों को जूडो में मेडल जीतकर जवाब देंगे। जानते हैं उनकी कहानी…

पिता टैक्सी ड्रायवर और मां खेतों में करती हैं काम

कपिल परमार ने बताया कि, ”वो तीन भाई और एक बहन हैं. उनके पिता टैक्सी ड्रायवर और मां गांव के ही जमींदारों के खेतों में काम करती थी. ऐसे में घर खर्च भी चलाना बहुत मुश्किल था. हम चार भाई बहनों की पढ़ाई लिखाई भी गांव के ही स्कूल में हुई.” कपिल ने बताया कि, ”जब वो कक्षा आठवीं में थे, तब से उनकी आंखों की रोशनी जाना शुरु हो गई थी. उन्हें केवल 80 प्रतिशत दिखाई देता था. जिसके बाद कपिल ने स्कूल जाना भी बंद कर दिया. हालांकि इस दौरान घर पर पढ़ाई जारी रखी. उस समय उनके पास इलाज के लिए भी पैसे नहीं थे. सीमित कमाई में परिवार का खर्च चलाना भी बड़ा कठिन होता था.”

डाइट के लिए दूसरों के खेतों में सोयाबीन काटी .कपिल ने बताया घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पिता को देखकर सोचा कि पहलवानी करूंगा और इनाम में मिले पैसों से घर वालों की मदद करूंगा। लेकिन पहलवानी के लिए डाइट चाहिए। इसके लिए दूसरों के खेतों में सोयाबीन काटी व दीवारें पोत दूध के पैसे जुटाए। करंट लगने के बाद स्कूल टीचर ने कह दिया हम आपको नहीं पढ़ा सकते, ब्लाइंड स्कूल जाओ। मेरा भाई ललित राइटर बना तभी सभी परीक्षाएं पास की।

8 से 10 घंटे खेतों में काम करने के बाद करते थे प्रैक्टिस

कपिल परमार ने बताया कि, ”अपने जीवन में काफी बलिदान दिया. अपनी डाइट और जूडो की प्रैक्टिस के लिए भी उनको खुद ही पैसे का इंतजाम करना होता था. ऐसे में कपिल अपनी मां के साथ गांव के जमींदारों के खेत में काम करते थे. यहां से जो भी पैसा मिलता था, उसे वो अपने खेल में लगाते थे. कपिल ने बताया कि पैरालंपिक तक पहुंचने में उनको कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. करीब 8 से 10 घंटे तक वो दूसरों के खेतों में काम करते थे, इसके बाद घर पर ही जूडो की प्रैक्टिस करते थे.” बता दें कि कपिल का सबसे छोटा भाई भी जूडो खिलाड़ी है. वहीं कपिल को जूडो की प्रैक्टिस कराता है.

जब लगा कुछ नहीं होने वाला, तब सिर्फ मां को यकीन था

कपिल कहते हैं- जब लगा कि कुछ भी नहीं होने वाला है, तब सिर्फ मां को यकीन था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। मां बोलीं बस खेलते रहो। बस यहीं से हिम्मत मिली। तभी जूडो के प्रशिक्षक भगवान सर ने मुझसे कहा कि तू ब्लाइंड कैटेगरी के लिए तैयारी कर। यहां से मुझे अपने जीवन में नई ऊर्जा मिली।

किसी भी टेक्निक को आसानी से सीख जाते हैं कपिल

कपिल किसी भी जूडो टेक्निक को आसानी से सीख जाते हैं। उनके कोच मुनव्वर अंजार बताते हैं कि जन्म से ब्लाइंड बच्चों को सिखाना आसान होता है, लेकिन कपिल की रोशनी जवानी में गई थी, फिर भी उनकी सीखने की क्षमता बेमिसाल है। उनका शार्प माइंड हर टेक्निक को तुरंत समझ लेता है।

पैरालिंपिक वालों को ए ग्रेड सरकारी नौकरी क्यों नहीं: कपिल बताते हैं, ओलिंपिक में भाग लेने वाले खिलाड़ियों को सरकार ए ग्रेड सरकारी नौकरी देती है। लेकिन पैरालिंपिक में मेडल जीतने वालों को कोई कुछ नहीं। इसपर ध्यान देना चाहिए। कपिल ने अब तक 17 नेशनल मुकाबले खेले जिसमें 15 में मैडल जीते हैं।

सरकार से मिले एक करोड़ रुपये इस तरह खर्च करेंगे कपिल

कपिल ने बताया कि, ”पहले उनका घर कच्चा था. खेती के लिए थोड़ी जमीन है. इसलिए सरकार से मिले पुरस्कार के एक करोड़ रुपये वह इन्हीं चीजों में लगाएंगे. उन्होंने बताया कि इस राशि से वो सबसे पहले अच्छा घर बनाएंगे. इसके बाद बची हुई राशि से गांव में जमीन खरीदेंगे. जिससे उनके जानवरों के लिए भी व्यवस्था हो सके. वर्तमान में कपिल परमार बीपीएड की पढ़ाई कर रहे हैं. अभी उनका लक्ष्य अगले पैरालंपिक की तैयारी करना और विश्व स्तर पर रैकिंग में सुधार करना है. इसके साथ ही वो भविष्य में खिलाड़ियों को फिजिकल ट्रेनिंग देना चाहते हैं. जिससे देश में अधिक से अधिक लोग आंलपिक और पैरालंपिक में पदक जीत सके.

 

SHUBHDA SHAKTI
Author: SHUBHDA SHAKTI

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