दिव्यांगों को वक्त पर नहीं मिल रही पेंशन, नियमों के फेर में 600 रु के लिए दफ्तर के लगा रहे चक्कर
दिव्यांगजन आज भी केवल ₹600 पेंशन पर जीने को मजबूर हैं. 2016 में ‘विकलांग’ शब्द हटाकर ‘दिव्यांग’ कहा गया, लेकिन ज़मीनी हालात नहीं बदले. न तो पेंशन राशि बढ़ी और न ही सुविधाएं. सरकार ने ₹1500 पेंशन का वादा किया था, पर अभी तक मंजूरी नहीं मिली. हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.

दिव्यांग’ कह देने से जिंदगी नहीं बदलती. मध्य प्रदेश में आज भी हजारों दिव्यांगजनों को सिर्फ ₹600 प्रति माह पेंशन मिल रही है. एक ऐसी राशि, जो न तो दवा दवा के लिए काफी है और न ही जीवन की मूलभूत जरूरतों के लिए. भोपाल की रहने वाली 38 वर्षीय शीतल धुले मसल डिस्ट्रॉफी जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं. उनका शरीर धीरे-धीरे काम करना बंद कर चुका है. उनके पति दिहाड़ी मजदूर हैं, जिनकी कमाई अक्सर दो वक्त की रोटी जुटाने में ही कम पड़lती.

बिस्तर पर पड़ी शीतल को हर दिन मां और पति की मदद की जरूरत होती है. लेकिन सरकारी मदद के नाम पर उन्हें सिर्फ ₹600 पेंशन मिलती है. शीतल कहती हैं, दर्द से ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि जैसे हमें भुला दिया गया है. शीतल का कहना है कि उनका जीवन अब बोझ बन गया है, जिसे हर दिन ढोना पड़ता है. शीतल का कहना है कि विदेशों में उनकी बीमारी का कोई इलाज नहीं है, लेकिन दर्द कम करने और शरीर को थोड़ा ठीक रखने के लिए इंजेक्शन मौजूद हैं, जिनकी कीमत कोरोड़ों रुपये में है.

दिव्यांगजनों को सिर्फ ₹600 प्रति माह पेंशन
कम पेंशन ने झूझने वाली शीतल अकेली नहीं हैं, 21 साल के शैलेंद्र और सागर जैसे दृष्टिबाधित छात्र भी उसी संघर्ष से जूझ रहे हैं. पढ़ाई के लिए भोपाल आए ये छात्र कई बार पेंशन भी नहीं पा पाते. ₹600 में न किताबें मिलती हैं, न भोजन. शैलेंद्र कहते हैं, कम से कम ₹1000 तो मिलना ही चाहिए. आदिवासी जिले अलीराजपुर से आने वाले ये युवक भोपाल में पढ़ाई कर रहे हैं. लेकिन 600 रुपये की पेंशन से वो होस्टल की फीस तक जमा नहीं करा पता हैं. कई दिन ऐसे होते हैं, जब उनके पास एक रुपया भी नहीं होता. शैलेंद्र और सागर का कहना है कि कम से कम उन्हें 1 हजार रुपये पेंशन तो मिलनी ही चाहिए.