Toggle Test

जी, सुना क्या ?? नेपाल त्रासदी, चीन की साजिश ??

नेपाल में मौत का सैलाब: 500 से ज्यादा मौतें, हजारों लापता; क्या सिर्फ कुदरत का कहर या चीन की भूमिका पर भी उठते सवाल?

काठमांडू/नई दिल्ली। नेपाल-चीन सीमा से सटे हिमालयी क्षेत्र में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने ऐसी तबाही मचाई है, जिसने पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर दिया है। नेपाल और तिब्बत में मृतकों की संख्या 500 के पार पहुंच चुकी है, जबकि दो हजार से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। राहत एवं बचाव अभियान लगातार जारी है और दुर्गम इलाकों तथा टूटी संचार व्यवस्था के कारण वास्तविक नुकसान का पूरा आकलन अभी बाकी है।

इस आपदा में भारतीय नागरिक भी प्रभावित हुए हैं। शुक्रवार शाम तक सामने आए आंकड़ों के अनुसार लापता लोगों में करीब 320 भारतीय नागरिक भी शामिल बताए गए हैं। हालात तेजी से बदल रहे हैं, इसलिए मृतकों और लापता लोगों की संख्या में आगे बदलाव संभव है।

आखिर कैसे आया मौत का यह सैलाब?

प्रारंभिक वैज्ञानिक जांच के मुताबिक हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्र में बर्फ, चट्टान और मलबे का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आया। इससे ल्हेंदे नदी का प्रवाह प्रभावित हुआ और इसके बाद पानी तथा मलबे की अत्यंत शक्तिशाली धारा ने निचले इलाकों में तबाही मचा दी।

ICIMOD से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक अब तक उपलब्ध साक्ष्य नेपाल की तरफ हुए हिमस्खलन को मुख्य ट्रिगर बताते हैं। सैटेलाइट तस्वीरों की जांच भी की जा रही है और वैज्ञानिकों का कहना है कि घटना की पूरी श्रृंखला स्थापित करने में अभी समय लग सकता है।

नेपाल के अधिकारियों ने शुरुआत में इस संभावना की भी जांच की कि तिब्बत में दर्ज भूकंपीय घटना से ग्लेशियर या चट्टानों का विशाल हिस्सा अस्थिर हुआ हो। नेपाल सरकार ने चीन और विभिन्न अनुसंधान संस्थानों से रियल-टाइम डेटा मांगा है ताकि आपदा के वास्तविक कारण का पता लगाया जा सके।

चीन पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

आपदा के बाद सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्टों में चीन की भूमिका को लेकर कई तरह के दावे सामने आए हैं। इनमें चीन की हिमालयी क्षेत्र में निर्माण गतिविधियों से लेकर तिब्बत में किसी बांध के टूटने तक की बातें कही गईं।

कुछ नेपाली पत्रकारों ने यह सवाल भी उठाया कि यदि चीन के पास ऊपरी हिमालयी क्षेत्र की निगरानी संबंधी जानकारी थी तो नेपाल को समय रहते चेतावनी क्यों नहीं मिल सकी। पिछले वर्ष की बाढ़ के बाद नेपाल और चीन के बीच बाढ़, भूस्खलन तथा ग्लेशियल जोखिमों से जुड़ी रियल-टाइम जानकारी साझा करने पर सहमति बनी थी। ऐसे में इस बार सूचना तंत्र कितना प्रभावी रहा, इसकी जांच महत्वपूर्ण है।

क्या इसके पीछे चीन की कोई ‘साजिश’ थी?

भारत में भी इस सवाल पर बहस शुरू हो गई है। एक पूर्व भारतीय खुफिया अधिकारी से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि चीन को संभावित खतरे की जानकारी पहले से रही हो सकती थी और नेपाल को पर्याप्त चेतावनी नहीं दी गई। हालांकि यह एक आरोप/आशंका है—अब तक प्रमाणित तथ्य नहीं।

इसी तरह सोशल मीडिया पर चीनी बांध टूटने और चीन की निर्माण गतिविधियों के कारण जानबूझकर या सीधे तौर पर बाढ़ आने के दावे प्रसारित हुए हैं। लेकिन अभी उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य इन दावों की पुष्टि नहीं करते।

प्रारंभिक सैटेलाइट विश्लेषण घटना की शुरुआत नेपाल की तरफ हुए बड़े हिम/चट्टान हिमस्खलन से होने की ओर संकेत करता है। ICIMOD से जुड़े विशेषज्ञों ने भी कहा है कि उपलब्ध साक्ष्य नेपाल की ओर हुए हिमस्खलन की तरफ इशारा करते हैं। इसलिए चीन द्वारा जानबूझकर यह आपदा पैदा किए जाने की बात को इस समय तथ्य कहना उचित नहीं होगा।

फिर चीन से जवाब मांगना क्यों जरूरी?

‘साजिश’ का प्रमाण नहीं होना और चीन से पारदर्शिता की मांग करना दो अलग-अलग बातें हैं।

नेपाल और चीन के बीच हिमालयी नदियां, ग्लेशियर और सीमावर्ती पारिस्थितिकी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। ऊपरी क्षेत्र में होने वाली घटना कुछ ही समय में नीचे बसे लाखों लोगों के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए भूकंप, ग्लेशियर की स्थिति, जलस्तर, भूस्खलन और संभावित प्राकृतिक बांधों से संबंधित डेटा तत्काल साझा होना बेहद महत्वपूर्ण है।

इस त्रासदी की निष्पक्ष वैज्ञानिक जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या खतरे के संकेत पहले उपलब्ध थे? यदि थे तो नेपाल तक चेतावनी कब पहुंची? दोनों देशों के बीच पहले से तय सूचना-साझाकरण व्यवस्था ने काम किया या नहीं? और क्या हिमालय में बढ़ती मानवीय गतिविधियों ने प्राकृतिक जोखिम को और गंभीर बनाया?

इन सवालों के जवाब किसी ‘षड्यंत्र सिद्धांत’ से नहीं, बल्कि सैटेलाइट डेटा, भूकंपीय रिकॉर्ड, मौसम संबंधी आंकड़ों और स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच से मिलने चाहिए।

जलवायु परिवर्तन भी बड़ा खतरा

वैज्ञानिक हिमालय के तेजी से बदलते पर्यावरण को लेकर लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं। बढ़ते तापमान के कारण बर्फ और ग्लेशियरों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक हाल के उच्च तापमान से तेजी से बर्फ पिघलने और ग्लेशियर के कमजोर होने की संभावना भी इस आपदा की जांच का हिस्सा है। नेपाल पिछले तीन दशकों में अपने ग्लेशियर बर्फ का बड़ा हिस्सा खो चुका है।

दिव्यांगजन के लिए आपदा कई गुना कठिन

ऐसी आपदाओं का सबसे गंभीर प्रभाव उन लोगों पर पड़ सकता है जो स्वयं तेजी से सुरक्षित स्थान तक नहीं पहुंच सकते। दिव्यांगजन, बुजुर्ग, बच्चे और गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए अचानक आने वाली बाढ़ में निकासी अत्यंत कठिन हो जाती है।

राहत शिविरों में रैंप और सुगम शौचालय, व्हीलचेयर एवं अन्य सहायक उपकरण, सांकेतिक भाषा में सूचना, दृष्टिबाधित लोगों के लिए सुलभ चेतावनी, आवश्यक दवाएं और दिव्यांग-अनुकूल परिवहन जैसी व्यवस्थाओं को राहत अभियान का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

शुभदा शक्ति का मानना है कि आपदा प्रबंधन तभी समावेशी कहा जा सकता है, जब अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक चेतावनी, बचाव और राहत समान रूप से पहुंचे।

निष्कर्ष

नेपाल की यह त्रासदी केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन और सीमापार आपदा-सूचना व्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी भी है।

चीन की भूमिका को लेकर सवाल जरूर उठ रहे हैं और उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन उपलब्ध प्रमाणों के बिना इसे ‘चीनी साजिश’ घोषित करना भ्रामक होगा। फिलहाल वैज्ञानिक साक्ष्य प्राकृतिक हिम/चट्टान हिमस्खलन की ओर संकेत करते हैं। असली सवाल यह है कि क्या इस आपदा को पहले पहचाना जा सकता था और क्या समय रहते सूचना साझा कर सैकड़ों जिंदगियां बचाई जा सकती थीं?

— शुभदा शक्ति डेस्क

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

Leave a Comment