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जी,सुना क्या ?? जब राजीव सरकार से भिड़ गया पूरा मीडिया:

इंदिरा गांधी ही नहीं, राजीव गांधी के एक फैसले ने भी दिला दी थी ‘इमरजेंसी’ की याद: 24 घंटे की हड़ताल पर उतरा मीडिया, आखिर झुकी सरकार

नई दिल्ली। भारत में प्रेस की आजादी का इतिहास जब भी लिखा जाता है, 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी और उस दौरान मीडिया पर लगी पाबंदियों का जिक्र जरूर होता है। लेकिन करीब 13 साल बाद उनके बेटे और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार भी एक ऐसे विवाद में घिर गई थी, जिसने पत्रकारों को इमरजेंसी के दौर की याद दिला दी। वजह थी—Defamation Bill, 1988, यानी मानहानि विधेयक।

हालांकि राजीव गांधी सरकार ने देश में 1975 जैसी संवैधानिक इमरजेंसी लगाने का प्रयास नहीं किया था, लेकिन इस विधेयक के प्रावधान इतने विवादास्पद माने गए कि देशभर के पत्रकार, संपादक, वकील और बुद्धिजीवी इसके विरोध में उतर आए।

क्या था 1988 का Defamation Bill?

राजीव गांधी सरकार ने अगस्त 1988 में यह विधेयक लोकसभा में पेश किया। 29 अगस्त को इस पर लोकसभा में चर्चा हुई और विधेयक निचले सदन से पारित हो गया। सरकार का तर्क था कि इसका उद्देश्य गलत और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली रिपोर्टिंग पर रोक लगाना है। लेकिन पत्रकार संगठनों ने इसे प्रेस को नियंत्रित करने की कोशिश बताया।

विधेयक में मानहानि की परिभाषा को व्यापक बनाने के साथ ऐसे प्रावधान प्रस्तावित थे, जिनमें कई परिस्थितियों में प्रकाशित सामग्री की सत्यता साबित करने का भार आरोपी पर आ सकता था। कुछ परिस्थितियों में मुकदमे की रिपोर्टिंग पर रोक और आरोपियों की व्यक्तिगत उपस्थिति जैसे प्रावधान भी चिंता का कारण बने। आलोचकों को डर था कि इससे खोजी पत्रकारिता और सरकार के खिलाफ खुलासे करना मुश्किल हो सकता है।

बोफोर्स विवाद के बीच आया विधेयक

यह वह समय था जब राजीव गांधी सरकार बोफोर्स सौदे को लेकर गंभीर राजनीतिक आरोपों का सामना कर रही थी और मीडिया लगातार इससे जुड़े खुलासे प्रकाशित कर रहा था। इसी माहौल में आए Defamation Bill ने सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए। विपक्ष और पत्रकार संगठनों ने आरोप लगाया कि कानून का इस्तेमाल सत्ता के खिलाफ होने वाली रिपोर्टिंग को दबाने में हो सकता है।

सड़कों पर उतरे देश के दिग्गज पत्रकार

विरोध धीरे-धीरे देशव्यापी आंदोलन बन गया। दिल्ली में पत्रकारों ने इंडिया गेट से बोट क्लब तक विशाल मार्च निकाला। रामनाथ गोयनका, खुशवंत सिंह, बी.जी. वर्गीज और कुलदीप नैयर जैसे प्रतिष्ठित पत्रकार विरोध में दिखाई दिए।

इसके बाद 6 सितंबर 1988 को देशभर के पत्रकारों और समाचार संस्थानों के कर्मचारियों ने हड़ताल की। राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उस दिन “Strike by journalists in the country against the Defamation Bill, 1988” पर चर्चा दर्ज है।

यह सिर्फ पत्रकारों की लड़ाई नहीं रही। वकील, छात्र, ट्रेड यूनियन और बुद्धिजीवी भी विरोध में शामिल हुए। यहां तक कि कांग्रेस के भीतर से भी विधेयक को लेकर असहमति सामने आने लगी।

आखिरकार सरकार को हटना पड़ा पीछे

बढ़ते विरोध ने राजीव गांधी सरकार पर भारी दबाव बनाया। सरकार पहले विधेयक को लेकर दृढ़ दिखाई दी, लेकिन देशव्यापी विरोध के बाद परिस्थितियां बदल गईं। अंततः सितंबर 1988 में सरकार ने विवादित Defamation Bill को वापस लेने का फैसला किया।

इस घटना को 1975 की इमरजेंसी के बराबर रखना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन 1988 का Defamation Bill भारतीय प्रेस की स्वतंत्रता के इतिहास की एक महत्वपूर्ण लड़ाई जरूर बन गया।

एक तरफ प्रचंड बहुमत वाली राजीव गांधी सरकार थी, दूसरी तरफ पत्रकारों और नागरिक समाज का संगठित विरोध। आखिरकार सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। यह घटना आज भी याद दिलाती है कि लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस केवल खबर पहुंचाने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था भी है।

— शुभदा शक्ति न्यूज़

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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