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जी,सुना क्या ?? क्यों गूंजता है भादो मास में ‘जय बाबा री” ।।

भादो में गूंजता है एक ही जयकारा—‘जय बाबा री’: जानिए कौन थे बाबा रामदेव, क्यों कहलाए रामसा पीर और क्यों रामदेवरा में उमड़ता है आस्था का सैलाब

राजस्थान की मरुभूमि में भाद्रपद यानी भादो का महीना आते ही वातावरण बदलने लगता है। सड़कों पर हाथों में ध्वजा लिए पदयात्री दिखाई देते हैं, सेवा शिविर और भंडारे सज जाते हैं और दूर-दूर तक एक ही स्वर सुनाई देता है—‘जय बाबा री’। यह आस्था है राजस्थान के महान लोकदेवता बाबा रामदेवजी की, जिन्हें लाखों श्रद्धालु ‘रामदेव पीर’, ‘रामसा पीर’ और ‘रूणीचा रा धणी’ के नाम से भी स्मरण करते हैं।

राजस्थान के जैसलमेर जिले में पोकरण से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित रामदेवरा आज देश के प्रमुख लोक-आस्था केंद्रों में गिना जाता है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार यह बाबा रामदेवजी का अंतिम विश्राम स्थल माना जाता है और यहां अलग-अलग धर्मों एवं समुदायों के श्रद्धालु पहुंचते हैं।

कौन थे बाबा रामदेवजी?

बाबा रामदेवजी राजस्थान के सर्वाधिक पूज्य लोकदेवताओं में शामिल हैं। लोक परंपरा में उन्हें द्वारिकाधीश भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है, जबकि जनसामान्य उन्हें ऐसे लोकदेवता के रूप में पूजता है जिन्होंने अपना जीवन कमजोर, वंचित और तत्कालीन समाज में भेदभाव झेल रहे लोगों की सेवा तथा सामाजिक समरसता के लिए समर्पित किया।

राजस्थान सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग से संबंधित रामदेवजी पैनोरमा में भी उनके जीवन के सामाजिक पक्ष का विशेष उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि बाबा रामदेवजी उन लोगों के साथ भी प्रेमपूर्वक बैठकर भजन-भाव करते थे जिन्हें तत्कालीन समाज में ‘अछूत’ माना जाता था और उन्होंने सामाजिक समरसता का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।

यही कारण है कि बाबा रामदेवजी की पहचान केवल चमत्कारों और धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। उनकी लोकगाथा में समानता, सेवा और मानवता का संदेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

बाबा रामदेवजी को ‘रामसा पीर’ क्यों कहा जाता है?

बाबा रामदेवजी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में ‘पांच पीरों’ की कथा आती है।

लोकमान्यता के अनुसार बाबा रामदेवजी की ख्याति दूर-दूर तक फैलने के बाद पांच पीर उनकी आध्यात्मिक शक्ति की परीक्षा लेने आए। बाबा से प्रभावित होकर उन्होंने उनकी महानता स्वीकार की। इसी लोककथा से बाबा रामदेवजी को ‘रामसा पीर’ अथवा ‘रामशाह पीर’ के रूप में प्रतिष्ठा मिलने की मान्यता जुड़ी हुई है।

इसी कारण उनकी आस्था की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक धार्मिक समन्वय है। राजस्थान पर्यटन विभाग भी रामदेवजी को हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बताता है और उल्लेख करता है कि सभी धर्मों के लोग रामदेवरा पहुंचते हैं।

इस तरह रामदेवरा में श्रद्धा किसी एक जाति या पंथ की सीमा में बंधी दिखाई नहीं देती।

भादो का महीना बाबा रामदेवजी के लिए इतना खास क्यों?

राजस्थान में भाद्रपद यानी ‘भादवा’ आते ही बाबा रामदेवजी की आराधना का विशेष दौर शुरू हो जाता है।

विशेष रूप से भाद्रपद शुक्ल द्वितीया—‘भादवा बीज’ से बाबा की आस्था का उत्सव चरम पर पहुंचता है। रामदेवरा का प्रसिद्ध भादवा मेला भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक आयोजित होने की परंपरा है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के उत्सव पोर्टल पर भी इस अवधि का उल्लेख मिलता है।

इस दौरान राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु रामदेवरा पहुंचते हैं।

कई श्रद्धालु सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा पैदल पूरी करते हैं। हाथ में बाबा की ध्वजा—जिसे कई स्थानों पर ‘नेजा’ कहा जाता है—लेकर चलने वाले जातरुओं की टोलियां भादो के दिनों में राजस्थान की सड़कों पर बाबा की आस्था की विशिष्ट पहचान बन जाती हैं।

रामदेवरा मंदिर—जहां बाबा की समाधि है आस्था का केंद्र

रामदेवरा जैसलमेर जिले में पोकरण से लगभग 12 किलोमीटर दूर जोधपुर-जैसलमेर मार्ग पर स्थित है। मंदिर के केंद्र में बाबा रामदेवजी की समाधि है। राजस्थान देवस्थान विभाग के अनुसार वर्तमान समाधि-मंदिर का निर्माण बीकानेर के महाराजा गंगासिंहजी ने करवाया था। मंदिर में मकराना पत्थर, जालियों और झरोखों का उपयोग इसकी स्थापत्य विशेषताओं में शामिल है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां प्रवेश जाति, पंथ अथवा धर्म के आधार पर सीमित नहीं है। देवस्थान विभाग भी इसे मंदिर की विशिष्टता के रूप में दर्ज करता है।

इसीलिए रामदेवरा केवल धार्मिक तीर्थ नहीं बल्कि राजस्थान की साझी संस्कृति और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक बन चुका है।

बाबा को क्या चढ़ाते हैं श्रद्धालु?

रामदेवरा पहुंचने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा और श्रद्धा के अनुसार प्रसाद तथा भेंट अर्पित करते हैं।

राजस्थान देवस्थान विभाग के मंदिर विवरण के अनुसार यहां मिठाई, नारियल, मखाने, मिश्री तथा कपड़े से बनी घोड़े की आकृति जैसी वस्तुएं अर्पित करने की परंपरा रही है। बाबा के गुणगान में भजन गाए जाते हैं और श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

बाबा रामदेवजी और घोड़े का क्या संबंध है?

बाबा रामदेवजी की लोकछवि में घोड़े का विशेष स्थान है। राजस्थान में गांव-गांव में बाबा की छवि अक्सर घोड़े पर सवार लोकदेवता के रूप में देखने को मिलती है। राजस्थान पर्यटन विभाग भी उनकी ऐसी लोकप्रिय छवि का उल्लेख करता है।

इसी परंपरा के कारण बाबा से संबंधित ध्वजाओं, खिलौनों, चित्रों और धार्मिक प्रतीकों में घोड़ा प्रमुखता से दिखाई देता है।

रामसरोवर—रामदेवरा की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव

रामदेवरा आने वाले श्रद्धालुओं के लिए रामसरोवर भी प्रमुख आस्था स्थल है।

लोकमान्यता है कि इसका निर्माण बाबा रामदेवजी ने करवाया था। राजस्थान सरकार के रामदेवजी पैनोरमा में भी रामसरोवर का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि श्रद्धालु इसके स्नान को अत्यंत पवित्र मानते हैं।

हालांकि किसी भी जलाशय के पानी से रोग ठीक होने जैसी मान्यताओं को धार्मिक आस्था के रूप में ही देखा जाना चाहिए; बीमारी होने पर चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

रामदेवरा में और क्या देखें?

रामदेवरा यात्रा केवल मुख्य समाधि मंदिर तक सीमित नहीं रहती। आसपास बाबा रामदेवजी से जुड़ी अनेक लोक-आस्था और ऐतिहासिक स्मृतियां हैं। इनमें रामसरोवर विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसके अलावा क्षेत्र में परचा बावड़ी जैसे स्थान भी यात्रियों के बीच जाने जाते हैं।

रामदेवरा से पोकरण भी नजदीक है। समय हो तो जैसलमेर की ओर यात्रा बढ़ाकर वहां के किले, हवेलियां, मरुस्थलीय क्षेत्र तथा अन्य ऐतिहासिक स्थलों को भी यात्रा में शामिल किया जा सकता है।

भादवा मेले में कैसा होता है माहौल?

भादो में रामदेवरा पहुंचना सामान्य दिनों से बिल्कुल अलग अनुभव होता है।

रास्तों पर पदयात्रियों की कतारें, बाबा के जयकारे, भजन-कीर्तन, ध्वजाएं, श्रद्धालुओं की टोलियां और जगह-जगह लगे सेवा शिविर राजस्थान की जीवंत लोक-संस्कृति का दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

रात में भी भजन और धार्मिक आयोजन चलते रहते हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार अगस्त-सितंबर के बीच होने वाले रामदेवरा मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और रातभर भक्ति गीत गाने की परंपरा भी देखने को मिलती है।

रामदेवरा कैसे पहुंचें?

सड़क मार्ग: रामदेवरा पोकरण से लगभग 12 किलोमीटर दूर जोधपुर-जैसलमेर मार्ग पर स्थित है।

रेल मार्ग: रामदेवरा में रेलवे स्टेशन है। राजस्थान देवस्थान विभाग के मंदिर प्रोफाइल में निकटतम रेलवे स्टेशन के रूप में रामदेवरा का उल्लेख किया गया है।

हवाई मार्ग: हवाई यात्रा करने वाले यात्री क्षेत्र के लिए उपलब्ध नजदीकी हवाई संपर्क का उपयोग कर आगे सड़क/रेल मार्ग से रामदेवरा पहुंच सकते हैं। Incredible India जैसलमेर और जोधपुर के हवाई संपर्क का उल्लेख करता है।

भादवा मेले के समय भीड़ अत्यधिक हो सकती है, इसलिए निकलने से पहले रेलवे/बस की उपलब्धता, स्थानीय यातायात व्यवस्था और प्रशासन की नवीनतम एडवाइजरी जरूर जांचनी चाहिए।

पहली बार रामदेवरा जा रहे हैं तो इन बातों का रखें ध्यान

भादो में जाने वाले श्रद्धालुओं को भीड़ को ध्यान में रखते हुए यात्रा की योजना पहले बना लेनी चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांग यात्रियों के साथ जा रहे हों तो ठहरने, दवाइयों और परिवहन की व्यवस्था पहले करना बेहतर है। पानी साथ रखें, निर्धारित मार्ग और प्रशासनिक निर्देशों का पालन करें तथा अनजान लोगों को पैसे या निजी जानकारी देने से बचें।

पदयात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए आरामदायक जूते/चप्पल, प्राथमिक उपचार सामग्री, जरूरी दवाएं और पहचान संबंधी जानकारी साथ रखना उपयोगी हो सकता है। अत्यधिक थकान या स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर धार्मिक संकल्प के कारण स्वास्थ्य को जोखिम में न डालें।

बाबा रामदेवजी की कथा का सबसे बड़ा संदेश

बाबा रामदेवजी को लेकर सदियों में अनेक चमत्कारिक लोककथाएं प्रचलित हुईं। किसी के लिए वे भगवान कृष्ण के अवतार हैं, किसी के लिए रामसा पीर और किसी के लिए गरीब-वंचित लोगों का सहारा देने वाले महान लोकदेवता।

लेकिन इन सभी मान्यताओं के बीच एक संदेश निर्विवाद रूप से उभरता है—मनुष्य की पहचान उसकी जाति, धर्म या सामाजिक हैसियत से नहीं, बल्कि मानवता से होनी चाहिए।

शायद यही कारण है कि सदियां गुजरने के बाद भी भादो आते ही राजस्थान की राहें फिर रामदेवरा की ओर मुड़ने लगती हैं।

किसी के कंधे पर नेजा होता है, किसी के होंठों पर भजन, कोई सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर आता है तो कोई परिवार सहित दर्शन करने पहुंचता है।

मंजिल सबकी एक होती है—रूणीचा धाम।

और मरुधरा में फिर वही स्वर गूंज उठता है—

“खम्मा-खम्मा ओ म्हारा रूणीचे रा धणिया…
जय बाबा री!”

एक नजर में रामदेवरा

आराध्य: लोकदेवता बाबा रामदेवजी / रामसा पीर
स्थान: रामदेवरा, पोकरण के निकट, जिला जैसलमेर, राजस्थान
विशेष पहचान: बाबा रामदेवजी की समाधि एवं प्रमुख तीर्थस्थल
प्रमुख पर्व: भादवा मेला
मुख्य अवधि: भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी
विशेषता: विभिन्न धर्मों और समुदायों की साझा आस्था
प्रमुख निकटस्थ आस्था स्थल: रामसरोवर
लोक संदेश: समानता, सेवा, सद्भाव और सामाजिक समरसता

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Author: APOORV SEN

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