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जी, सुना क्या ?? छेड़छाड़ का ‘वायरल’ सच: सोशल मीडिया दोषी या समाज की सोच?

छेड़छाड़ के वायरल वीडियो: क्या समाज में बढ़ रही है हिंसा या अब अधिक दिखने लगा है सच?

जमुई से दिल्ली तक सामने आई घटनाओं ने उठाए गंभीर सवाल; विशेषज्ञों की नजर में सोशल मीडिया अकेला दोषी नहीं, लैंगिक सोच और दंड का कमजोर भय बड़ी वजह

देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्राओं और युवतियों से छेड़छाड़, अभद्रता तथा जबरदस्ती के वीडियो लगातार सामने आ रहे हैं। बिहार के जमुई और समस्तीपुर से लेकर दिल्ली के मुखर्जी नगर तथा पर्यटन स्थलों तक हुई कथित घटनाएं बताती हैं कि महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न केवल किसी एक शहर या प्रदेश तक सीमित नहीं है।

अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के मुखर्जी नगर में एक छात्रा ने कार सवार युवक पर बदतमीजी करने और उसे जबरन वाहन में बैठाने की कोशिश का आरोप लगाया। वहीं बिहार के जमुई और समस्तीपुर की कथित घटनाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए। ऐसी घटनाओं पर कार्रवाई आवश्यक है।

क्या सोशल मीडिया ने समस्या बढ़ाई है?

सोशल मीडिया को इस समस्या का एकमात्र कारण मानना सही नहीं होगा। वास्तव में इसकी भूमिका दोहरी है। एक ओर कैमरे और सोशल प्लेटफॉर्म ऐसी घटनाओं को सामने लाने, सबूत सुरक्षित करने और प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बनाने में सहायक हैं। दूसरी ओर, हिंसक या अपमानजनक वीडियो जब मनोरंजन और सनसनी की तरह साझा किए जाते हैं तो अपराधियों को पहचान और प्रसिद्धि मिलने लगती है।

वायरल होने की चाह, लाइक और व्यू की प्रतिस्पर्धा तथा महिलाओं को अपमानित करने वाली सामग्री का सामान्यीकरण कुछ युवाओं के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। लेकिन सोशल मीडिया मूल बीमारी नहीं, बल्कि समाज में पहले से मौजूद विकृत सोच को बढ़ाने और उसका प्रदर्शन करने वाला माध्यम भी है।

असली कारण समाज की सोच में

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, लैंगिक असमानता और महिलाओं के प्रति हानिकारक सामाजिक मान्यताएं हिंसा के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। बचपन से लड़कों को अधिकार और लड़कियों को सहनशीलता से जोड़कर देखने वाली सोच आगे चलकर असम्मानजनक व्यवहार का आधार बन सकती है।

विशेषज्ञ दृष्टि से इसके पीछे कई परतें दिखाई देती हैं—

  1. महिलाओं को स्वतंत्र व्यक्ति के बजाय नियंत्रण की वस्तु समझना।
  2. सहमति यानी ‘कन्सेंट’ की सही समझ का अभाव।
  3. परिवार और शिक्षण संस्थानों में लैंगिक संवेदनशीलता पर खुली बातचीत न होना।
  4. दोस्तों के समूह में अभद्रता को बहादुरी या मजाक समझना।
  5. शिकायत नहीं होने या कार्रवाई देर से होने के कारण कानून का भय कमजोर पड़ना।
  6. अश्लील, हिंसक और स्त्री-विरोधी डिजिटल सामग्री का बार-बार संपर्क।
  7. सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी, प्रकाश व्यवस्था और त्वरित सहायता की कमी।
  8. घटनाएं बढ़ीं या रिपोर्टिंग?

वायरल वीडियो की संख्या देखकर सीधे यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं कि अपराध उसी अनुपात में बढ़ गए हैं। स्मार्टफोन, सीसीटीवी, ऑनलाइन शिकायत व्यवस्था और महिलाओं में बढ़ती जागरूकता के कारण पहले छिप जाने वाली घटनाएं अब दर्ज और सार्वजनिक हो रही हैं। इसलिए बढ़ती दृश्यता को वास्तविक अपराध-वृद्धि से अलग करके समझना जरूरी है। हाल के आधिकारिक आंकड़े भी बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की संख्या अभी गंभीर स्तर पर बनी हुई है।

समाधान केवल गिरफ्तारी नहीं

त्वरित गिरफ्तारी जरूरी है, लेकिन स्थायी बदलाव के लिए परिवार, स्कूल, पुलिस, न्याय व्यवस्था और डिजिटल प्लेटफॉर्म—सभी को जिम्मेदारी निभानी होगी। विद्यालयों और कॉलेजों में सहमति, सम्मानजनक संबंध और डिजिटल व्यवहार की शिक्षा दी जानी चाहिए। शिकायत पर तुरंत प्रतिक्रिया, समयबद्ध जांच और पीड़िता-केंद्रित सहायता व्यवस्था भरोसा बढ़ा सकती है।

वीडियो बनाने वाले लोगों को भी पीड़िता की पहचान और गरिमा सुरक्षित रखनी चाहिए। किसी संवेदनशील वीडियो को बिना चेहरा धुंधला किए प्रसारित करना पीड़िता को दोबारा मानसिक आघात पहुंचा सकता है। आपात स्थिति में 112, महिला हेल्पलाइन 181 और राष्ट्रीय महिला आयोग की 14490 हेल्पलाइन से सहायता ली जा सकती है।

निष्कर्ष यही है कि सोशल मीडिया समस्या का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जड़ समाज में मौजूद लैंगिक असमानता, सहमति की अनदेखी और दंड से बच निकलने की मानसिकता है। कैमरा अपराध को उजागर कर सकता है—उसे रोकने के लिए सोच, शिक्षा और व्यवस्था तीनों को बदलना होगा।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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