कड़वी हुई चीनी: एथेनॉल कितना जिम्मेदार? एक महीने में ₹48 से ₹55 के पार पहुंचे दाम, जानिए आगे क्या होगा

नई दिल्ली। त्योहारों का सीजन करीब आते ही आम आदमी की रसोई पर महंगाई का एक और दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। देश में चीनी की कीमतों में पिछले कुछ सप्ताह में तेज उछाल आया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई 2026 को चीनी का औसत खुदरा मूल्य ₹48.18 प्रति किलो था, जो 20 अगस्त को बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गया। यानी महज एक महीने में कीमत करीब 16 प्रतिशत बढ़ गई।
कीमतों में इस तेजी के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या पेट्रोल में मिलाए जाने वाले एथेनॉल के उत्पादन के लिए गन्ने और चीनी का इस्तेमाल बढ़ना इसकी वजह है? केंद्र सरकार ने इस धारणा को खारिज करते हुए कहा है कि मौजूदा मूल्य वृद्धि को सीधे एथेनॉल से जोड़ना सही नहीं है।
आखिर क्यों महंगी हो रही है चीनी?
मौजूदा चीनी सीजन 2025-26 में उत्पादन पहले लगाए गए अनुमान से काफी कम रहने की संभावना है। गन्ना उत्पादक राज्यों ने शुरुआत में लगभग 343 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया था, लेकिन अब इसे घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया है। यानी शुरुआती अनुमान की तुलना में उत्पादन लगभग 11 प्रतिशत कम रह सकता है।
इसके पीछे प्रतिकूल मौसम, कुछ प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में गन्ने की फसल को नुकसान और अपेक्षा से कम रिकवरी जैसे कारण बताए जा रहे हैं। इसके साथ ही अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की मांग सामान्य तौर पर बढ़ती है। मांग बढ़ने और आपूर्ति पर दबाव के इस मेल ने बाजार में कीमतों को ऊपर धकेला है।
एथेनॉल कितना जिम्मेदार?
भारत सरकार पिछले कई वर्षों से पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा दे रही है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के मुताबिक एथेनॉल सप्लाई ईयर 2024-25 में पेट्रोल में 19.24 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग हासिल की गई थी और 2025-26 के लिए 20 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया है।
चीनी उद्योग भी इस कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गन्ने के रस, शुगर सिरप और विभिन्न प्रकार के मोलासेस से एथेनॉल बनाया जा सकता है।
लेकिन सरकार का तर्क है कि मौजूदा महंगाई का मुख्य कारण एथेनॉल नहीं है। रिपोर्टों के मुताबिक एथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 के लगभग 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत रह गया है। इसलिए सरकार का कहना है कि कीमतों में हाल की तेजी को केवल एथेनॉल डायवर्जन का परिणाम बताना आंकड़ों के अनुरूप नहीं है।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार चीनी सीजन 2022-23 में करीब 43 लाख टन, 2023-24 में 24 लाख टन और 2024-25 में करीब 34 लाख टन चीनी एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट हुई थी।
फिर बाजार में इतना उछाल क्यों?
कम उत्पादन के अलावा बाजार में स्टॉक और जमाखोरी को लेकर भी सरकार सतर्क हुई है। रिकॉर्ड कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने थोक उपभोक्ताओं पर स्टॉक रखने की सीमा कड़ी करने का फैसला किया है। 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले बड़े उपभोक्ताओं को अधिकतम 15 दिनों की जरूरत के बराबर स्टॉक रखने की अनुमति होगी। इससे पहले डीलरों के लिए भी स्टॉक सीमा लागू की गई थी।
क्या विदेश से चीनी मंगानी पड़ेगी?
बाजार में उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों पर नियंत्रण के लिए सरकार आयात का विकल्प भी इस्तेमाल कर सकती है। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक सीमित मात्रा में ड्यूटी-फ्री चीनी आयात सहित कई उपायों पर विचार किया गया है। ऐसा होने पर करीब एक दशक बाद भारत को विदेश से महत्वपूर्ण मात्रा में चीनी आयात करनी पड़ सकती है।
यह कदम घरेलू बाजार में अतिरिक्त सप्लाई उपलब्ध कराने और त्योहारों के दौरान कीमतों को नियंत्रण में रखने में मदद कर सकता है।
क्या अभी और महंगी होगी चीनी?
इस सवाल का निश्चित जवाब अभी देना मुश्किल है। त्योहारों के कारण आने वाले महीनों में मांग ऊंची रहने की संभावना है और उत्पादन अनुमान में कटौती से सप्लाई पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में अल्प अवधि में कीमतों पर दबाव पूरी तरह खत्म होने की गारंटी नहीं है।
दूसरी ओर सरकार स्टॉक लिमिट, बाजार निगरानी और जरूरत पड़ने पर आयात जैसे कदम उठा रही है। यदि इनसे बाजार में पर्याप्त सप्लाई आती है और नया चीनी उत्पादन समय पर शुरू होता है, तो कीमतों की तेजी पर अंकुश लग सकता है।
एथेनॉल को अकेले दोष देना कितना सही?
मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि चीनी की महंगाई की कहानी केवल एथेनॉल तक सीमित नहीं है। कम उत्पादन, खराब मौसम, त्योहारी मांग, वैश्विक बाजार में तंगी और स्टॉकिंग जैसे कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं।
एथेनॉल कार्यक्रम का चीनी उद्योग की मांग और सप्लाई के समीकरण से संबंध जरूर है, क्योंकि गन्ने और चीनी आधारित उत्पादों का एक हिस्सा ईंधन उत्पादन में जाता है। लेकिन सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस सीजन में एथेनॉल की ओर डायवर्जन का अनुपात पहले की तुलना में कम है। इसलिए मौजूदा मूल्य वृद्धि के लिए अकेले एथेनॉल को जिम्मेदार ठहराना तस्वीर का केवल एक हिस्सा दिखाता है।
फिलहाल उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि त्योहारों से पहले सरकार के सप्लाई बढ़ाने वाले कदम कितनी जल्दी बाजार में असर दिखाते हैं। अगर उत्पादन और उपलब्धता में सुधार नहीं हुआ तो चीनी के दाम ऊंचे बने रह सकते हैं, जबकि आयात और नए सीजन की सप्लाई कीमतों को राहत दे सकती है।







