भगत सिंह की फांसी के बाद किसे मिली जमीन, किसे ₹20 हजार और किसे प्रमोशन? इतिहास का कम चर्चित अध्याय

शुभदा शक्ति विशेष
शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित अध्यायों में है। लेकिन लाहौर षड्यंत्र केस का एक दूसरा पहलू भी है—इस मुकदमे में ब्रिटिश सरकार की ओर से गवाही देने वाले कुछ लोगों और फांसी की प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों को बाद में कथित तौर पर मिले इनाम, जमीन और पदोन्नतियां।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को विशेष ट्रिब्यूनल ने 7 अक्टूबर 1930 को मौत की सजा सुनाई थी और 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। मुकदमे के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1930 में विशेष अध्यादेश के जरिए ट्रिब्यूनल गठित किया था।
अपने ही साथी बने सरकारी गवाह
लाहौर षड्यंत्र केस में जय गोपाल, हंसराज वोहरा, फणींद्र नाथ घोष, मनमोहन बनर्जी और ललित कुमार मुखर्जी जैसे नाम सरकारी गवाह यानी ‘अप्रूवर’ के रूप में सामने आए। इन गवाहियों ने अभियोजन के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इतिहासकारों और बाद में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, जय गोपाल की गवाही मुख्य रूप से सॉन्डर्स हत्याकांड से जुड़ी थी, जबकि हंसराज वोहरा ने क्रांतिकारी संगठन और भगत सिंह की गतिविधियों से संबंधित जानकारी दी।
₹20 हजार से लेकर 50 एकड़ जमीन तक
The Tribune में प्रकाशित एक ऐतिहासिक विवरण के मुताबिक, फांसी के बाद जय गोपाल को ₹20,000 का पुरस्कार मिला। वहीं फणींद्र नाथ घोष और मनमोहन बनर्जी को बिहार के चंपारण में 50-50 एकड़ जमीन दिए जाने का उल्लेख मिलता है। रिपोर्ट के अनुसार हंसराज वोहरा ने आर्थिक लाभ नहीं लिया, लेकिन पंजाब सरकार ने उनकी लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई को प्रायोजित किया।
ये रकम उस दौर की थी, इसलिए ₹20,000 का तत्कालीन आर्थिक महत्व आज के ₹20,000 से बिल्कुल अलग था।
अधिकारियों को भी मिले प्रमोशन
इसी ऐतिहासिक विवरण में दावा किया गया है कि जेल सुपरिंटेंडेंट मेजर पी.डी. चोपड़ा को फांसी के दो दिन बाद DIG Prisons, Punjab बनाया गया। DIG Prisons लेफ्टिनेंट कर्नल एन.आर. पुरी बाद में IG Prisons बने। लाहौर षड्यंत्र केस के जांच अधिकारी खान बहादुर शेख अब्दुल अजीज को भी आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन मिला और उन्हें लायलपुर में 50 एकड़ जमीन दिए जाने का उल्लेख है। शवों के निस्तारण से जुड़े DSP सुदर्शन सिंह को भी Additional Superintendent of Police पद पर पदोन्नति मिलने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
इतिहास का सवाल सिर्फ फांसी तक सीमित नहीं
इन विवरणों को पढ़ते समय यह अंतर समझना जरूरी है कि मुकदमे और अप्रूवरों की भूमिका ऐतिहासिक/कानूनी रिकॉर्ड में दर्ज है, जबकि फांसी के बाद दिए गए अलग-अलग पुरस्कारों के कई विवरण बाद की ऐतिहासिक रिपोर्टिंग और शोध पर आधारित हैं।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की कहानी इसलिए केवल तीन क्रांतिकारियों की शहादत की कहानी नहीं है। यह औपनिवेशिक न्याय व्यवस्था, सरकारी गवाहों की भूमिका और उस पूरे तंत्र को समझने का भी अवसर है जिसके बीच भारत का स्वतंत्रता आंदोलन आगे बढ़ रहा था।
आपके विचार में इतिहास के ऐसे कम चर्चित दस्तावेज और तथ्य नई पीढ़ी तक अधिक विस्तार से पहुंचाए जाने चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।






