जनादेश किसका, सत्ता किसकी? अजमेर के नतीजे ने खड़ा किया लोकतंत्र का बड़ा सवाल
अजमेर। लोकतंत्र में चुनाव का परिणाम केवल यह नहीं बताता कि सत्ता की कुर्सी पर कौन बैठा, बल्कि कई बार यह उससे बड़ा सवाल खड़ा करता है—जनता ने क्या संदेश दिया और राजनीतिक व्यवस्था ने उस संदेश को किस रूप में सत्ता में बदला?

अजमेर नगर निगम के ताजा घटनाक्रम को इसी कसौटी पर देखने की जरूरत है। 80 वार्डों के चुनाव में कांग्रेस 37 पार्षदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, भाजपा को 32 और निर्दलीयों को 11 सीटें मिलीं। यानी किसी भी दल को अपने बूते 41 का बहुमत हासिल नहीं था।
लेकिन महापौर के चुनाव में तस्वीर पलट गई। भाजपा की अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले और कांग्रेस की किरण गढ़वाल 37 मतों पर रहीं। इस तरह वार्ड चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी रही भाजपा महापौर पद जीतने में सफल रही।
क्या सबसे बड़ी पार्टी का बोर्ड बनना ही जनादेश है?
पहली नजर में 37 बनाम 32 का आंकड़ा कांग्रेस के पक्ष में दिखाई देता है। लेकिन स्थानीय निकाय की चुनावी व्यवस्था में पार्षद का चुनाव और महापौर का चुनाव दो अलग राजनीतिक चरण हैं। राजस्थान के नियमों के तहत महापौर का चुनाव निर्वाचित सदस्यों के जरिए होता है और एक से अधिक प्रत्याशी होने पर मतदान गुप्त मतपत्र से कराया जाता है।
इसलिए कानूनी दृष्टि से सबसे ज्यादा वार्ड जीतने वाली पार्टी को स्वतः महापौर पद मिलने का अधिकार नहीं हो जाता। उसे सदन में आवश्यक समर्थन जुटाना पड़ता है।
यही अंतर राजनीतिक वैधता और नैतिक जनादेश की बहस को जन्म देता है।
कांग्रेस यह कह सकती है कि जनता ने उसे भाजपा से पांच अधिक वार्ड देकर सबसे बड़ी पार्टी बनाया। भाजपा की ओर से इसका जवाब यह हो सकता है कि महापौर का चुनाव अलग संवैधानिक-वैधानिक प्रक्रिया है और उसमें जिसे निर्वाचित पार्षदों का बहुमत मिला, वही विजेता है।
दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं—वार्ड चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी और महापौर चुनाव में भाजपा ने बहुमत हासिल किया।
असली कहानी 11 निर्दलीयों की
इस चुनाव की राजनीतिक धुरी वास्तव में भाजपा या कांग्रेस से अधिक वे 11 निर्दलीय पार्षद थे, जिनके बिना दोनों प्रमुख दल बहुमत से दूर थे। कांग्रेस को 41 तक पहुंचने के लिए केवल चार अतिरिक्त मत चाहिए थे, जबकि भाजपा को नौ। चुनाव से पहले कांग्रेस ने पांच निर्दलीयों के समर्थन का सार्वजनिक दावा भी किया था।
इसके बावजूद अंतिम मतदान 43-37 रहा।
यही परिणाम कांग्रेस की रणनीति पर गंभीर राजनीतिक सवाल खड़े करता है। यदि उसके पास अपने 37 पार्षदों के अतिरिक्त निर्दलीयों का घोषित समर्थन था, तो वह समर्थन मतदान तक क्यों नहीं पहुंचा? दूसरी ओर भाजपा 32 से 43 तक कैसे पहुंची? गुप्त मतदान के कारण प्रत्येक मत किस पार्षद ने किसे दिया, इसे प्रमाण के बिना निश्चित रूप से बताना उचित नहीं होगा। इसलिए इसे सीधे “वोटों की चोरी” या “खरीद-फरोख्त” कहना तथ्य के बजाय आरोप होगा।
कांग्रेस की उपलब्धि भी कम नहीं
नतीजे के दूसरे पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2021 के अजमेर नगर निगम चुनाव में भाजपा ने 48 और कांग्रेस ने केवल 18 वार्ड जीते थे। इस बार तस्वीर बदलकर कांग्रेस 37 और भाजपा 32 पर पहुंच गई।
अर्थात सीटों के स्तर पर अजमेर के मतदाताओं ने पांच साल में उल्लेखनीय बदलाव किया है। इसे भाजपा के लिए राजनीतिक संकेत और कांग्रेस के लिए संगठनात्मक पुनरुत्थान—दोनों दृष्टियों से पढ़ा जा सकता है। लेकिन कांग्रेस की विडंबना यह रही कि वार्डों की लड़ाई में हासिल बढ़त को वह सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुंचा सकी।
नैतिकता बनाम चुनावी गणित
क्या कम सीटों वाली पार्टी को नैतिक आधार पर सबसे बड़ी पार्टी को सत्ता बनाने का मौका देना चाहिए था?
राजनीतिक नैतिकता के स्तर पर इस पर बहस संभव है, लेकिन कानूनी व्यवस्था अलग है। वर्तमान प्रणाली बहुमत जुटाने का अवसर देती है; वह यह शर्त नहीं लगाती कि महापौर उसी दल का होगा जिसने सर्वाधिक वार्ड जीते हों। इसलिए भाजपा की जीत को केवल इसलिए अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता कि उसके पास प्रारंभ में कांग्रेस से कम पार्षद थे। दूसरी तरफ यह सवाल भी वैध है कि मतदाता द्वारा वार्ड स्तर पर दिए गए राजनीतिक संदेश और बाद में पार्षदों द्वारा किए गए सत्ता-निर्णय के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों पैदा हुआ।
और शायद अजमेर के परिणाम की सबसे महत्वपूर्ण सीख भी यही है।
यह केवल भाजपा की जीत या कांग्रेस की हार की कहानी नहीं है। यह प्रत्यक्ष जनादेश और अप्रत्यक्ष सत्ता-निर्माण के बीच मौजूद उस दूरी की कहानी है, जिस पर लोकतंत्र को समय-समय पर विचार करना चाहिए।
आज भाजपा के पास महापौर की कुर्सी है और कांग्रेस के पास सबसे बड़ी पार्टी होने का आंकड़ा। लेकिन जनता के सामने असली परीक्षा अब शुरू होगी—नगर निगम अगले पांच वर्षों में अजमेर को क्या देता है?
क्योंकि लोकतंत्र का अंतिम हिसाब केवल यह नहीं होता कि कुर्सी किसने जीती, बल्कि यह भी होता है कि उस कुर्सी से जनता ने क्या पाया।





