समान नागरिक संहिता विधेयक-2026: बेटियों को संपत्ति में बराबर अधिकार, बहुविवाह पर रोक; लिव-इन रिलेशनशिप भी आएंगे कानूनी दायरे में
जयपुर। राजस्थान में समान नागरिक संहिता विधेयक-2026 (UCC Bill 2026) को लेकर बड़ी पहल की गई है। प्रस्तावित विधेयक में विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों के लिए समान कानूनी व्यवस्था बनाने के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को भी कानूनी दायरे में लाने के प्रावधान शामिल हैं। वहीं बेटियों को संपत्ति में बेटों के समान अधिकार देने और बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विधेयक विधानसभा में प्रस्तुत किया जा चुका है। अब इसे विधानसभा की समिति के समक्ष भेजा गया है, जहां इसके विभिन्न प्रावधानों पर चर्चा की जाएगी। अखबार में प्रकाशित जानकारी के अनुसार विधेयक में कुल 309 पृष्ठ और 403 धाराएं हैं।

विवाह के लिए सभी नागरिकों पर समान नियम
प्रस्तावित कानून का उद्देश्य राज्य के नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति, विरासत और भरण-पोषण जैसे मामलों में अलग-अलग पर्सनल लॉ के स्थान पर एक समान नागरिक व्यवस्था लागू करना है।
विधेयक के अनुसार जीवित जीवनसाथी रहते हुए दूसरा विवाह प्रतिबंधित होगा। विवाह का पंजीकरण भी अनिवार्य किए जाने का प्रावधान है। निर्धारित अवधि में पंजीकरण नहीं कराने पर जुर्माने की व्यवस्था प्रस्तावित है।
विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला की 18 वर्ष निर्धारित की गई है।
लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण भी होगा जरूरी
विधेयक का एक प्रमुख पहलू लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत लाना है। लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को अपनी साझेदारी की सूचना अथवा पंजीकरण निर्धारित अधिकारी के समक्ष कराना होगा।
इसका उद्देश्य ऐसे संबंधों से जुड़े अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्पष्ट कानूनी ढांचे में लाना बताया गया है।
बेटियों को संपत्ति में बेटों के समान अधिकार
विधेयक में बेटियों को पैतृक और अन्य संपत्ति में बेटों के समान उत्तराधिकार देने का प्रावधान महत्वपूर्ण है। यह व्यवस्था विवाहित और अविवाहित दोनों बेटियों पर लागू होने की बात कही गई है।
कानून लागू होने पर विवाह और तलाक से जुड़े मामलों में भी महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने का लक्ष्य है।
लिव-इन से जन्मे बच्चों के अधिकार भी होंगे सुरक्षित
प्रस्तावित व्यवस्था में लिव-इन रिलेशनशिप और पारिवारिक संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है। ऐसे बच्चों को कानूनन वैध संतान मानते हुए माता-पिता की संपत्ति और भरण-पोषण से जुड़े अधिकार दिए जाने का प्रावधान है।
इसका महत्व उन बच्चों के लिए विशेष रूप से अधिक है, जिन्हें माता-पिता के संबंध की प्रकृति के कारण सामाजिक अथवा कानूनी भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है।
बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध
विधेयक में बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान किया गया है। यानी जीवित पति या पत्नी रहते दूसरा विवाह करने की अनुमति नहीं होगी।
इसके साथ विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से संबंधित नियमों को अधिक समान, स्पष्ट और एकीकृत करने का प्रयास किया गया है।
अनुसूचित जनजातियों को मिल सकती है विशेष सुरक्षा
प्रस्तावित कानून में राजस्थान की अनुसूचित जनजातियों के रीति-रिवाजों और परंपराओं की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान रखे जाने की बात भी सामने आई है, ताकि उनकी सांस्कृतिक परंपराओं और अधिकारों को संरक्षण मिल सके।
दिव्यांगजनों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कानून?
Shubhda Shakti के दृष्टिकोण से इस विधेयक का एक महत्वपूर्ण पहलू दिव्यांग नागरिकों के विवाह, संपत्ति, विरासत और पारिवारिक अधिकारों से भी जुड़ा है।
दिव्यांग व्यक्ति भी अन्य नागरिकों की तरह विवाह, परिवार, संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े समान अधिकारों के हकदार हैं। किसी भी समान नागरिक कानून को लागू करते समय यह सुनिश्चित किया जाना महत्वपूर्ण होगा कि दिव्यांग महिलाओं और पुरुषों को कानूनी प्रक्रियाओं में समान और सुलभ भागीदारी मिले।
विवाह पंजीकरण, तलाक, संपत्ति के बंटवारे अथवा अन्य कानूनी प्रक्रिया में दिव्यांग व्यक्ति को सूचना और सेवाएं सुलभ प्रारूप में उपलब्ध कराना भी जरूरी होगा। विशेष रूप से दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित, बौद्धिक अथवा अन्य प्रकार की दिव्यांगता वाले नागरिकों के लिए प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि वे अपने कानूनी अधिकारों को स्वतंत्र रूप से समझ और इस्तेमाल कर सकें।
अभी कानून नहीं, विधायी प्रक्रिया बाकी
यह ध्यान रखना जरूरी है कि विधेयक पेश होना और उसका कानून बन जाना अलग-अलग चरण हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार विधेयक को विधानसभा की समिति के पास चर्चा के लिए भेजा गया है। समिति में विचार-विमर्श और आगे की विधायी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इसके अंतिम स्वरूप और लागू होने वाले प्रावधानों की स्थिति स्पष्ट होगी।
ऐसे में सोशल मीडिया पर प्रसारित दावों के बजाय विधेयक के अंतिम पारित स्वरूप और आधिकारिक अधिसूचना को आधार बनाना महत्वपूर्ण होगा।
Shubhda Shakti संदेश:
कानून की समानता तभी सार्थक है, जब उसकी पहुंच समाज के प्रत्येक नागरिक तक समान रूप से हो—और इसमें दिव्यांगजन भी बराबर के भागीदार हों।






