सवाल:
मैं राजस्थान से हूं। मेरा बेटा 8 साल का है। बचपन से वह तुतलाकर बोलता था। तब हमें उसकी तोतली आवाज प्यारी लगती थी। हमें लगा कि उम्र बढ़ने के साथ उसकी बोलने की आदत अपने आप ठीक हो जाएगी, इसलिए हमने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन अब वह स्कूल जाता है और आज भी कई शब्द साफ नहीं बोल पाता। वह टीचर से भी तुतलाकर बात करता है। स्कूल में बच्चे उसका मजाक उड़ाते हैं। हमें अब चिंता होने लगी है। उसकी भाषा और उच्चारण सुधारने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
8 साल की उम्र में भी तुतलाकर बोलना क्यों है चिंता की बात?
हर माता-पिता को शुरुआत में बच्चे की तोतली आवाज प्यारी लगती है। कई बार माता-पिता सोचते हैं कि बच्चा बड़ा होने के साथ खुद ही साफ बोलना सीख जाएगा। लेकिन हर बच्चे का भाषा विकास अलग होता है और हर स्थिति अपने आप ठीक हो जाए, यह जरूरी नहीं है।
आमतौर पर 8 साल की उम्र तक बच्चे ज्यादातर शब्दों का स्पष्ट उच्चारण करने लगते हैं। अगर इस उम्र में भी बच्चे को कई शब्द बोलने में परेशानी हो रही है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
तुतलाने या शब्दों का स्पष्ट उच्चारण न कर पाने के पीछे स्पीच डेवलपमेंट से जुड़ी समस्या, जीभ और मुंह की मांसपेशियों के बीच सही तालमेल न होना, सुनने से जुड़ी परेशानी या पर्याप्त अभ्यास न होना जैसी कई वजहें हो सकती हैं। इसलिए सबसे पहले समस्या का सही कारण समझना जरूरी है।
छोटे बच्चों का तुतलाना कब सामान्य माना जाता है?
जब बच्चा बोलना सीख रहा होता है, तब उसकी जीभ, होंठ, जबड़े और मुंह की मांसपेशियां पूरी तरह विकसित नहीं होतीं। साथ ही बच्चा अलग-अलग ध्वनियों और शब्दों का सही उच्चारण करना भी सीख रहा होता है।
इस वजह से 2 से 4 साल की उम्र तक कुछ शब्दों का गलत उच्चारण करना या कुछ ध्वनियों को बदलकर बोलना भाषा विकास का सामान्य हिस्सा हो सकता है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उच्चारण में धीरे-धीरे स्पष्टता आनी चाहिए।
अगर बच्चा 7-8 साल की उम्र के बाद भी लगातार कई शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पा रहा है, तो विशेषज्ञ से मूल्यांकन कराना बेहतर होता है।
बच्चे के तुतलाने की असल वजह कैसे समझें?
बच्चे की बोलने की समस्या को समझने के लिए माता-पिता को कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिए—
बच्चा किन अक्षरों या शब्दों का गलत उच्चारण करता है?
समस्या कब से है और समय के साथ इसमें सुधार हुआ है या नहीं?
क्या बच्चे को सिर्फ बोलने में परेशानी है या भाषा समझने में भी दिक्कत होती है?
क्या बच्चे को सुनने में कोई समस्या तो नहीं है?
परिवार में किसी अन्य सदस्य को बचपन में ऐसी समस्या रही है या नहीं?
क्या बच्चा स्कूल, दोस्तों या परिवार के सामने बोलने से बचने लगा है?
क्या उसकी बोलने की समस्या के कारण आत्मविश्वास प्रभावित हो रहा है?
जरूरत पड़ने पर स्पीच-लैंग्वेज थेरेपिस्ट से बच्चे का मूल्यांकन कराया जा सकता है। इससे समस्या का कारण समझने और उसी के अनुसार थेरेपी व अभ्यास शुरू करने में मदद मिलती है।
तुतलाने वाले बच्चे की भाषा कैसे सुधारें?
माता-पिता को बच्चे पर सही बोलने का दबाव बनाने के बजाय धैर्य और सकारात्मक रवैया रखना चाहिए।
बच्चे से रोज नियमित बातचीत करें और उसे अपनी बात कहने का पूरा मौका दें।
उसकी बात ध्यान से सुनें और उसे बीच में न रोकें।
खुद साफ और सरल भाषा में बोलें, ताकि बच्चा सही शब्द और उच्चारण सुनकर सीख सके।
बच्चे के गलत बोलने पर डांटने या बार-बार टोकने के बजाय सही शब्द को सहज तरीके से दोहराएं।
कहानियां सुनाएं और चित्रों वाली किताबें पढ़ें।
गाने, कविताएं और राइम्स सुनाएं।
रोजमर्रा की बातचीत में नए शब्दों का इस्तेमाल करें और उनका अर्थ समझाएं।
खेल-खेल में भाषा सिखाएं, जैसे चित्र पहचानना, रंगों और वस्तुओं के नाम बताना।
बच्चे को दूसरे बच्चों के साथ खेलने और बातचीत करने का अवसर दें।
स्क्रीन टाइम सीमित रखें, ताकि बच्चे को बातचीत और सामाजिक गतिविधियों के पर्याप्त अवसर मिलें।
बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से न करें।
भाषा विकास में अभ्यास की भूमिका महत्वपूर्ण
अगर बच्चा हल्का तुतलाता है, तो नियमित और सही तरीके से किए गए अभ्यास से उसकी बोलने की क्षमता में सुधार हो सकता है। इसके लिए रोज कुछ समय भाषा और उच्चारण से जुड़ी गतिविधियां कराई जा सकती हैं।
अभ्यास को कभी भी सजा या दबाव की तरह नहीं लेना चाहिए। खेल-खेल में और बच्चे को प्रोत्साहित करते हुए अभ्यास कराना ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
अभ्यास के दौरान बच्चे की छोटी-छोटी प्रगति की भी तारीफ करें। इससे उसके अंदर बोलने का आत्मविश्वास बढ़ेगा।
टीचर से बात करना भी जरूरी
बच्चा दिन का बड़ा हिस्सा स्कूल में बिताता है, इसलिए शिक्षक की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। माता-पिता को बच्चे की बोलने की समस्या के बारे में टीचर से खुलकर बात करनी चाहिए।
अगर दूसरे बच्चे उसका मजाक उड़ाते हैं, तो स्कूल को संवेदनशील और सहयोगी माहौल बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।
टीचर से यह भी अनुरोध किया जा सकता है कि बच्चे को जवाब देने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए। उससे जल्दबाजी में जवाब देने की अपेक्षा न की जाए और पूरी क्लास के सामने उसकी बोलने की समस्या को लेकर उसे शर्मिंदा न किया जाए।
पेरेंट्स की ये गलतियां बच्चे का आत्मविश्वास कम कर सकती हैं
कई बार माता-पिता अनजाने में ऐसी बातें कह देते हैं, जिनसे बच्चे की समस्या कम होने के बजाय उसका आत्मविश्वास प्रभावित हो सकता है।
गुस्से में बच्चे से ये बातें कहने से बचें—
“सीधे बोलो।”
“तुमसे ठीक से बोला भी नहीं जाता।”
“इतने बड़े हो गए, फिर भी ऐसे बोलते हो।”
याद रखें, बच्चा जानबूझकर गलत नहीं बोल रहा है। उसे आलोचना से ज्यादा सहयोग, धैर्य और प्रोत्साहन की जरूरत है।
कब एक्सपर्ट की मदद लेना जरूरी है?
इन स्थितियों में स्पीच एंड लैंग्वेज थेरेपिस्ट या पीडियाट्रिशियन से सलाह लेना उचित है—
बच्चा 7-8 साल की उम्र के बाद भी स्पष्ट रूप से नहीं बोल पा रहा हो।
उसकी बात समझने में दूसरों को परेशानी होती हो।
बच्चा बातचीत करने से बचने लगा हो।
उसे बोलने में झिझक या डर महसूस होने लगा हो।
स्कूल में पढ़ाई या दोस्तों के साथ बातचीत पर असर पड़ रहा हो।
बोलने की समस्या के कारण बच्चे के आत्मविश्वास में कमी दिखाई दे रही हो।
बच्चे को डांट नहीं, समझ और सहयोग चाहिए
बच्चे की बोलने की समस्या पर खुद को दोष देने की जरूरत नहीं है। हालांकि अब इसे नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए।
सही मूल्यांकन, नियमित अभ्यास और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद से बच्चे की बोलने और संवाद करने की क्षमता में सुधार लाने में मदद मिल सकती है।
सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे को घर और स्कूल, दोनों जगह सुरक्षित और सहयोगी माहौल मिले। उसकी बोलने की समस्या को लेकर उसका मजाक न बनाया जाए और न ही उसे शर्मिंदा किया जाए।
याद रखिए—बच्चे को इस समय सबसे ज्यादा जरूरत है धैर्य, प्रोत्साहन और आत्मविश्वास की। परिवार और स्कूल का सहयोग मिलने पर बच्चा बिना डर के अपनी बात कहना सीख सकता है और धीरे-धीरे अपने उच्चारण पर भी बेहतर काम कर सकता है।
Shubhda Shakti की अपील: अगर आपके बच्चे को बोलने, सुनने, सीखने या संवाद करने में उम्र के अनुसार परेशानी हो रही है, तो समय रहते बाल रोग विशेषज्ञ या संबंधित स्पीच-लैंग्वेज विशेषज्ञ से सलाह लें।







