हादसे में खोया एक हाथ-एक पैर, पर नहीं खोया हौसला… साइकिल से पूरी की 7 हजार किमी की यात्रा, दिया ये खास संदेश
सजुल टुडू ने एक हाथ, एक पैर हादसे में गंवाने के बावजूद 156 दिनों में 11 राज्यों में 7330 किलोमीटर साइकिल यात्रा की. वे दिव्यांग जनों के लिए मिसाल हैं कि वे जो चाहें कर सकते हैं, बस हौसला बुलंद होना चाहिए.

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है. यह पंक्ति हजारीबाग के सजुल टुडू पर बिल्कुल सटीक बैठती है. दिव्यांग होने के बावजूद उनका हौसला किसी से कम नहीं है. उन्होंने दिव्यांगता को दरकिनार कर साइकिल यात्रा की और दूसरों को सीख देने का काम किया. एक हाथ और एक पैर न होने के बावजूद उन्होंने 156 दिनों में देश के 11 राज्यों में 7330 किलोमीटर का सफर तय किया. उनकी चाहत है कि पूरे देश में यात्रा कर दिव्यांगों को प्रेरित करें.
दिव्यांग पर हौसले बुलंद
एक हाथ और एक पैर से दिव्यांग होने के बावजूद उनके हौसले बुलंद हैं. जीवन की कठिनाइयों को ताकत बनाकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि हिम्मत से बड़ी कोई ताकत नहीं. हजारीबाग के टाटीझरिया निवासी 27 वर्षीय सजुल टुडू ने साइकिल के सहारे 156 दिनों में देश के 11 राज्यों का 7 हजार से अधिक किलोमीटर का सफर पूरा किया. इस सफर का मकसद केवल दूरी तय करना नहीं था, बल्कि समाज को यह संदेश देना था कि दिव्यांगता किसी की राह में रुकावट नहीं बन सकती.
इतने राज्यों का कर चुके भ्रमण
लोकल 18 झारखंड से बातचीत में सजुल टुडू ने बताया कि साल 2014 में ट्रांसमिशन लाइन पर काम करते समय ऊंचाई से गिरने के बाद उन्होंने एक हाथ और एक पैर खो दिया. लेकिन हार मानने के बजाय उन्होंने जिंदगी को नए सिरे से जीने का निर्णय लिया. डॉक्टरों ने भी हिम्मत दी और फिर 18 मार्च 2025 को उन्होंने हजारीबाग से अपनी यात्रा शुरू की.
इस यात्रा में उन्होंने बंगाल, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उड़ीसा होते हुए हजारों किलोमीटर का सफर तय किया. जगह-जगह पर लोगों ने आर्थिक और मानवीय सहायता की. किसी ने रुकने की जगह दी तो किसी ने रोटी उपलब्ध करवाई.
सजुल टुडू ने आगे कहा कि दिव्यांगता शारीरिक होती है, मानसिक नहीं. अगर मन में हिम्मत हो तो जीवन की कोई भी कठिनाई व्यक्ति को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती. उनका स्पष्ट संदेश है कि हौसला अगर बुलंद हो तो दिव्यांगता राह में रोड़ा नहीं बनती. वे खुद इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. ऐसे में वे लोग जो छोटी-छोटी परेशानियों के आने पर परेशान हो जाते हैं, ये उनके लिए भारी सबक है.