भारत की दृष्टिबाधित क्रिकेट टीम का नेतृत्व करने से लेकर पद्मश्री प्राप्त करने तक, शेखर नाइक का प्रेरणादायक सफर
शेखर नाइक के परिवार में अंधापन वंशानुगत है। जन्म से अंधे होने से लेकर भारत के लिए विश्व कप जीतने तक – यह उनकी प्रेरणादायक यात्रा है।

बचपन से ही आंखों की रोशनी से वंचित शेखर नाइक असल जिंदगी के नायक हैं। अपनी शारीरिक कमजोरी पर काबू पाते हुए शेखर ने एक सफल क्रिकेटर का मुकाम हासिल किया।
कर्नाटक के एक छोटे से जिले शिमोगा में जन्मा शेखर बचपन से ही आंखों की रोशनी से वंचित था। यह उसके परिवार की आनुवांशिक बीमारी थी। शेखर की मां नानी भी दृष्टिहीन थीं। आठ साल की उम्र में एक दिन अचानक शेखर नदी में गिर गया। इस हादसे ने उसकी जिंदगी को एक नया मोड़ दिया। इसी समय शिमोगा में एक आई कैंप लगा था। आपात इलाज के लिए जब शेखर वहां पहुंचा तो उसकी आंखों की जांच भी की गई। जांच से पता लगा कि शेखर की आंखों की रोशनी वापस आ सकती थी।

ब्लाइंड स्कूल से खेलना शुरू किया क्रिकेट
इलाज के लिए उसे बेंगलुरु लाया गया और एक ऑपरेशन के बाद शेखर की दाई आंख की रोशनी 60 प्रतिशत तक लौट आई। आंखों की रोशनी लौटने के तीन महीने के भीतर ही शेखर के पिता का देहांत हो गया। पिता की मृत्यु के डेढ़ साल बाद शेखर की मां ने उसे एक ब्लाइंड स्कूल में दाखिला दिला दिया। इस वक्त उसकी उम्र 11 वर्ष थी और उसने पहली क्लास में प्रवेश लिया था। इसी दौरान उसने क्रिकेट खेलना शुरू किया।
अपने स्कूल के लिए शेखर ने इस समय स्टेट लेवल टूर्नामेंट खेला। उसके साथी उसकी दृष्टिहीनता का मजाक बनाते थे, लेकिन मुश्किल घड़ियों में मां उसका हौसला बंधाती। क्रिकेट में बड़ा मुकाम हासिल करने की प्रेरणा शेखर को मां से मिली थी। 12 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते शेखर की मां भी चल बसी। अब उसके पास कोई नहीं था, जो उसका ख्याल रखता और उसे प्रोत्साहित करता। संघर्ष के इस दौर में भी उसने हिम्मत नहीं हारी। छुटि्टयों में खेतों में काम करके शेखर अपनी फीस और पढ़ाई का खर्च जुटाता था।

एक टूर्नामेंट ने बदल दी जिंदगी
शेखर ने 1997 में शिवमोग्गा के श्री शारदा देवी दृष्टिहीन विद्यालय में एक बच्चे के रूप में अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत की। और तब से लेकर अब तक जो कुछ भी हुआ, उसका श्रेय वह अपनी माँ को देते हैं।
“बचपन में, कोई भी बच्चा मेरे साथ सिर्फ़ इसलिए नहीं खेलता था क्योंकि मैं अंधा हूँ। इससे मेरी माँ को बहुत दुख होता था। वह कहती थीं, ‘तुम्हारी विकलांगता के कारण दूसरे लोग तुम्हें खेलने के लिए नहीं बुलाते। लेकिन तुम्हें उन्हें ग़लत साबित करना चाहिए और कुछ ऐसा करना चाहिए कि न सिर्फ़ गाँव, बल्कि पूरा देश तुम पर गर्व करे।'” वह याद करते हैं।
हालाँकि शेखर अपने शुरुआती सालों में क्रिकेट के बहुत बड़े प्रशंसक नहीं थे, लेकिन स्कूल में दूसरे बच्चों को खेलते देखकर उन्हें प्रेरणा मिलती थी। वे कहते हैं, “जब मैंने अपनी माँ को इसके बारे में बताया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने मुझसे कहा, ‘अब जब तुम खेलना शुरू कर ही दिए हो, तो तुम्हें इसी मैदान में खेलते रहना चाहिए।’ वे हमेशा से मेरे लिए एक बड़ी प्रेरणा रही हैं।”
उन्हें अपनी स्कूल टीम में चुना गया, जिसके लिए उन्होंने चार साल तक खेला। 2000 में, एक स्कूल टूर्नामेंट में खेलते हुए, उन्होंने 46 गेंदों में 136 रन बनाए। यहीं पर उन पर क्रिकेट एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड इन इंडिया (CABI) की नज़र पड़ी, जो नेत्रहीनों के लिए क्रिकेट के संचालन, आयोजन और विकास के लिए सर्वोच्च संस्था है। CABI, दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण के लिए कार्यरत एक गैर-लाभकारी संस्था, समर्थनम ट्रस्ट फॉर द डिसेबल्ड की क्रिकेट शाखा और पहल है। शेखर को उनके प्रदर्शन के आधार पर अंततः राज्य टीम के लिए चुना गया।
बाद में, CABI द्वारा आयोजित एक दक्षिण क्षेत्र टूर्नामेंट के फाइनल में, उन्होंने केरल के खिलाफ 249 रन बनाए। इस स्कोर ने उन्हें भारतीय दृष्टिबाधित क्रिकेट टीम में जगह दिलाने में मदद की और उन्होंने 2002 के एक दिवसीय विश्व कप में खेला, जो दृष्टिबाधित क्रिकेट टीमों के लिए दूसरी बार आयोजित किया गया विश्व कप था (पहला विश्व कप 1998 में आयोजित किया गया था)।
इसी दौर में स्कूल के एक फिजिकल ट्रेनर का प्रशिक्षण उसके काफी काम आया। शेखर बताते हैं, वे प्रैक्टिस के दौरान मेरे पीछे खड़े रहते थे और हर गलत शॉट पर डंडे से मारते थे। इस डर की वजह से मैं कोई शॉट नहीं छोड़ता था। अब दिन रात उसके जेहन में क्रिकेट ही छाया रहता था। सन 2000 ई. में शेखर ने एक टूर्नामेंट में महज 46 गेंदों में 136 रन बनाकर सभी को चौंका दिया और उन्हें कर्नाटक टीम में प्रवेश मिल गया। अब उनके आत्मविश्वास को काफी बल मिला। एक टूर्नामेंट के फाइनल मुकाबले में शेखर ने 249 रनों की पारी खेली, जिसके बाद तो सारे रास्ते मानो खुलते चले गए।

2001 में अंडर 18 टूर्नामेंट में उन्हें मैन ऑफ सीरीज चुना गया, Smart बाद उनका चयन भारत की विश्व कप टीम में हो गया।
2002 के एक दिवसीय विश्व कप में खेला|
2012 के टी 20 विश्व कप में शेखर भारत की ब्लाइंड टीम के कप्तान रहे। कड़े संघर्ष को इस मुकाम तक पहुंचा कर शेखर ने एक ऐसी मिसाल कायम की, जहां शारीरिक अक्षमता को कभी किसी हार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
2014 के वनडे विश्व कप के बाद, टीम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का मौका मिला। शेखर कहते हैं, “वे हमारे प्रदर्शन से बहुत खुश थे। जब टीम के एक सदस्य ने उनसे ऑटोग्राफ माँगा, तो उन्होंने पलटकर हम सभी से ऑटोग्राफ माँग लिए। हमने उनसे अपनी समस्याओं के बारे में भी बात की और बताया कि हमें पर्याप्त प्रायोजक और प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।”

जहां तक पद्मश्री की बात है तो उनकी खुशी को शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
मैं इस जीत को अन्य क्रिकेटरों, क्रिकेट प्रेमियों और अपने दृष्टिबाधित दोस्तों को समर्पित करना चाहता हूँ। मुझे खुशी है कि अब बहुत से लोगों को पता चलेगा कि दृष्टिबाधित लोग भी क्रिकेट खेल रहे हैं। वे हमारा समर्थन करने के लिए आगे आएँगे और हमारे मैचों में पूरा स्टेडियम खचाखच भरा होगा,”