अरुणिमा सिन्हा एक ऐसा नाम है जो आज भारत ही नहीं, पूरे विश्व में हौसले, आत्मविश्वास और जज़्बे की मिसाल बन चुकी हैं। एक समय की राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी, अरुणिमा का जीवन एक भयावह हादसे के बाद पूरी तरह बदल गया — लेकिन उन्होंने अपनी नियति को खुद लिखा और विश्व की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर इतिहास रच दिया।
ट्रेन हादसा जिसने बदल दी ज़िंदगी
14 अप्रैल 2011 को अरुणिमा लखनऊ से दिल्ली जा रही थीं। ट्रेन में कुछ अपराधियों ने उनकी चैन खींचने की कोशिश की और विरोध करने पर उन्हें चलती ट्रेन से धक्का दे दिया। दूसरे ट्रैक पर से एक ट्रेन गुजरने के कारण उनका बायाँ पैर बुरी तरह कुचल गया और अंततः कटवाना पड़ा। यह हादसा किसी के भी जीवन को तोड़ सकता था, लेकिन अरुणिमा ने इस चुनौती को अपने जीवन का टर्निंग पॉइंट बना लिया।
अवसाद से आत्मबल की ओर
हादसे के बाद, अस्पताल में इलाज के दौरान ही अरुणिमा ने तय कर लिया कि वो एवरेस्ट चढ़ेंगी। यह सुनकर लोगों ने इसे एक असंभव सपना समझा, लेकिन उनके दृढ़ संकल्प ने असंभव को संभव कर दिखाया। उन्होंने पर्वतारोहण की ट्रेनिंग प्रसिद्ध पर्वतारोही बछेंद्री पाल से ली।
एवरेस्ट विजय — एक ऐतिहासिक पल
21 मई 2013 को अरुणिमा ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया। वह ऐसा करने वाली विश्व की पहली दिव्यांग महिला पर्वतारोही बन गईं। उनका यह कारनामा सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि लाखों लोगों के लिए एक प्रेरणा बन गया।
सम्मान और उपलब्धियां
भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
उन्होंने अपनी जीवन-गाथा पर आधारित पुस्तक “Born Again on the Mountain” भी लिखी है।
अरुणिमा ने कई और चोटियों जैसे किलीमंजारो (अफ्रीका), एल्ब्रुस (यूरोप) और कोज़ियसको (ऑस्ट्रेलिया) पर भी चढ़ाई की है।
एक मिशन, एक प्रेरणा
आज अरुणिमा सिन्हा एक मोटिवेशनल स्पीकर हैं और दिव्यांग जनों के लिए एक फ्री स्पोर्ट्स ट्रेनिंग सेंटर भी चला रही हैं। वह समाज को यह संदेश देती हैं कि “अगर इच्छा शक्ति मजबूत हो, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।”

