Trending Story
Advertisement

राजस्थान के बुटाटी मंदिर में लकवा रोग से सात दिन में मिलती है मुक्ति, जानें मान्यता और इतिहास

रहस्यों से भरा है यह मंदिर, क्या सच में यहां पैरालिसिस के मरीज हो जाते हैं ठीक! जानें बुटाटी धाम के बारे में

मान्यता है कि इस मंदिर में सात दिन तक आरती-परिक्रमा करने से लकवा के मरीज ठीक हो जाता है। जनआस्था के इस केंद्र की ख्याति देश ही नहीं विदेशों तक हैं। वहां से भी लकवे के मरीजों को उनके परिजन धाम में लेकर आते हैं।

प्रसिद्ध संत चतुरदास महाराज मंदिर में इन दिनों लकवा से ग्रस्त मरीजों की संख्या काफी देखी जा रही है. दावा है कि इस मंदिर में लकवा के मरीज ठीक हो जाते हैं.

लकवे से पीड़ित लोगों के इलाज के लिए प्रसिद्ध संत चतुरदास महाराज मंदिर में इन दिनों भक्तों की भीड़ बढ़ रही है. लोगों का दावा है, कि इस मंदिर में लकवा से ग्रस्त मरीज को 7 दिन रोका जाता है. सुबह शाम नियमित रूप से आरती एवं परिक्रमा करने के बाद, भभूत ग्रहण करने से लकवे के मरीजों की तकलीफ खत्म हो जाती है. यह मंदिर संपूर्ण भारत में बुटाटी धाम के नाम से प्रसिद्ध है

लकवे से पीड़ित लोग पहुंच रहे हैं मंदिर

वहीं इसको लेकर पुजारी मुकेश वैष्णव ने बताया कि मंदिर में श्रद्धालुओं का सुबह से ही भक्तों के आने का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो देर शाम तक चलता है. भक्तों के लिए किसी को परेशानी नहीं आए इसके लिए मंदिर प्रशासन की ओर से यात्रियों के लिए चरण दर्शन व परिक्रमा के बारे में लाउडस्पीकर से लगातार सूचना दी जाती है. मंदिर पुजारी ने दावा किया, कि लकवे से पीड़ित लोगों के परिजन लगातार मंदिर में पहुंच रहे हैं और आरती में शामिल हो रहे हैं.

बुटाटी धाम के नाम से प्रसिद्ध है मंदिर

वहीं, अध्यक्ष देवेंद्र सिंह ने बताया, कि नागौर के बुटाटी धाम में संत चतुरदास जी महाराज का मंदिर है. इस मंदिर को लेकर मान्‍यता है कि इस मंदिर में सात दिन तक आरती-परिक्रमा करने से पैरालिसिस के मरीज ठीक होकर जाते हैं. लोगों का दावा है कि सात दिन बाद लकवा ठीक हो जाता है या बहुत हद तक सुधार होते हुए देखा गया है. यह मंदिर संपूर्ण भारत में बुटाटी धाम के नाम से प्रसिद्ध है.

कहां है बुटाटी धाम?

बुटाटी धाम मंदिर नागौर जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूर नागौर-अजमेर हाइवे पर डेगाना तहसील में स्थित है। धाम के सबसे निकट रेलवे स्टेशन मेड़ता रोड़ है जो करीब 45 किलोमीटर दूरी पर है। मरीजों और उनके परिजनों को रुकने के लिए धाम में व्यवस्था की गई है। यहां आने वाले हजारों लोग और मरीज धाम परिसर में ही ठहरते हैं।

क्या हैं लकवा ग्रस्त मरीजों के नियम?

बुटाटी धाम में लकवे के मरीजों और उनके परिजनों को केवल सात दिन और रात रुकने की अनुमति होती है। ज्यादा दिन रुकने पर मंदिर प्रबंधक समिति जाने के लिए कह देती है। इसका कारण जानने के लिए अमर उजाला की टीम ने मंदिर प्रबंधक समिति के अध्यक्ष शिव सिंह से बात की तो उन्होंने बताया कि यहां पर नए लोग आते रहते हैं। पुराने लोग अगर समय पर नहीं जाएंगे तो नए मरीजों को जगह मिलने में समस्या होगी। हमारी कोशिश रहती है कि यहां आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को किसी तरह की परेशानी न हो। इसलिए सात दिन बाद मरीजों को जाने के लिए कह देते हैं। उन्होंने बताया कि यहां आने वाले मरीजों का सबसे पहले रजिस्ट्रेशन किया जाता है। उसके बाद उसे निशुल्क राशन सामग्री दी जाती है और दर्ज तारीख के अनुसार 7 दिन में जगह खाली करनी होती है। ऐसा नहीं करने वालो से जाने का आग्रह भी करते हैं।

विदेशों से भी आते हैं मरीज

प्रबंधक समिति के अध्यक्ष शिव सिंह ने बताया कि धाम में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया अफगानिस्तान सहित अन्य देशों से भी लकवे की बीमारी से परेशान मरीज आते हैं। मंदिर समिति द्वारा किसी तरह का प्रचार प्रसार नहीं किया जाता है। लोगों के जरिए ही एक दूसरे को पता चलता है। पिछले कई साल से लोग अपनी आस्था के कारण यहां आ रहे हैं।

धाम की धार्मिक कहानी

बुटाटी धाम मंदिर को लेकर एक कहानी प्रचलित है। बताया जाता है कि करीब 600 साल पहले यहां चतुरदास जी नाम के संत थे। उनके पास 500 से अधिक बीघा जमीन थी जो उन्होंने दान कर दी और आरोग्य की तपस्या करने चले गए। सिद्धि प्राप्त करने के बाद वह यहां वापस आए और समाधि ले ली। उस स्थल पर ही यह मंदिर बना हुआ है।

 

SHUBHDA SHAKTI
Author: SHUBHDA SHAKTI

Leave a Comment

Advertisement
Trending Story
Toggle Dark Mode

Menu