पाकिस्तान में सियासी भूचाल! इमरान खान की पार्टी से छिनी सत्ता, खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी।
इमरान की रिहाई के लिए निकले मार्च के बीच शहबाज सरकार का बड़ा फैसला, लोकतंत्र और संविधान पर छिड़ी नई जंग; क्या और गहराएगा पाकिस्तान का राजनीतिक संकट?

शुभदा शक्ति न्यूज़ | अंतरराष्ट्रीय डेस्क | 11 अक्टूबर 2026
इस्लामाबाद / अजमेर पाकिस्तान में सत्ता और सियासत के बीच टकराव अब संवैधानिक संकट का रूप लेता दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू कर दिया है। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की मंजूरी के बाद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की निर्वाचित प्रांतीय सरकार के अधिकार निलंबित कर दिए गए। इस फैसले ने पाकिस्तान की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है।
इमरान की रिहाई का आंदोलन बना टकराव की वजह?
जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई की मांग को लेकर खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी के नेतृत्व में हजारों समर्थकों ने इस्लामाबाद की ओर मार्च शुरू किया था। आंदोलन के दौरान केंद्र और प्रांतीय सरकार के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया। बातचीत के प्रयास विफल होने के बाद दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए।
आतंकवाद पर कार्रवाई या राजनीतिक रणनीति?
शहबाज सरकार का तर्क है कि अफगानिस्तान सीमा से सटे खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ रही हैं और प्रांतीय प्रशासन आतंकवाद विरोधी प्रयासों में पर्याप्त सहयोग नहीं कर रहा था।
दूसरी ओर, PTI ने इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक जनादेश पर हमला बताते हुए इसे राजनीतिक विरोध को दबाने का प्रयास करार दिया है। पार्टी नेताओं ने चेतावनी दी है कि इस फैसले से देश में अस्थिरता और बढ़ सकती है।
संविधान के सहारे सत्ता का नियंत्रण
पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत आपातकाल तथा गवर्नर शासन लागू किया गया है। इस व्यवस्था में प्रांतीय सरकार के अधिकार केंद्र के नियंत्रण में आ सकते हैं। हालांकि, निर्वाचित सरकार के अधिकार निलंबित करने के फैसले ने संघीय व्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
अब पाकिस्तान में आगे क्या होगा?
राजनीतिक विश्लेषण के नजरिए से यह घटनाक्रम केवल एक प्रांत की सत्ता तक सीमित नहीं है। इसके प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा व्यवस्था और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी पड़ सकते हैं।
यदि PTI आंदोलन तेज करती है तो सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है। वहीं, आपातकाल के संवैधानिक औचित्य को लेकर विवाद भी गहरा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान की सरकार राजनीतिक मतभेदों का समाधान संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निकाल पाएगी, या सत्ता और विपक्ष का यह संघर्ष देश को एक और लंबे संवैधानिक संकट की ओर ले जाएगा?
फिलहाल पाकिस्तान की सियासत एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सरकार का हर फैसला और विपक्ष का हर कदम देश की राजनीतिक स्थिरता की नई परीक्षा बन सकता है।
स्रोत: Reuters, Associated Press और Dawn | 11 अक्टूबर 2026






