
हरियाली तीज जहां शिव-पार्वती के पुनर्मिलन का पावन पर्व है, वहीं उससे एक दिन पहले मनाया जाने वाला “सिंजारा” भी उतना ही महत्व रखता है। पर क्या आपने कभी सोचा है कि हरियाली तीज से पहले सिंजारा क्यों जरूरी माना गया है? इसका जवाब छिपा है हमारी सांस्कृतिक परंपराओं और स्त्री-सम्मान की एक सुंदर अभिव्यक्ति में।
✨ क्या है सिंजारा की परंपरा?
सिंजारा, जिसे सिंधारा दूज भी कहा जाता है, हरियाली तीज से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाओं और बेटियों को मायके से विशेष उपहार भेजे जाते हैं—जैसे की मिठाइयाँ, मेहंदी, नए कपड़े, आभूषण और श्रृंगार का सामान। यही “सिंजारा” कहलाता है। यह एक ऐसा दिन होता है जब महिलाएं अपने सौंदर्य, संस्कृति और रिश्तों को खास मान देती हैं।
💚 सिंजारा कैसे मनाया जाता है?
इस दिन बहू-बेटियों को नौ प्रकार की मिठाइयाँ और पकवान परोसे जाते हैं। महिलाएं मेहंदी लगाकर, नए वस्त्र पहनकर श्रृंगार करती हैं और एक-दूसरे को सिंजारे के तोहफे भेंट करती हैं। कई जगहों पर झूले लगाए जाते हैं और पारंपरिक गीतों के साथ उत्सव का रंग गहरा हो जाता है।
शाम को माता पार्वती की पूजा के बाद महिलाएं अपनी सास को सिंधारा भेंट कर सौभाग्य और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।
🎁 सिंजारा में शामिल चीजें:
मेहंदी और चूड़ियाँ
साड़ी या लहंगा
मिठाइयाँ जैसे घेवर, लड्डू, गुजिया
गहने या कॉस्मेटिक आइटम
पूजन की थाली
🌿 क्यों जरूरी है सिंजारा?
सिंजारा सिर्फ श्रृंगार तक सीमित नहीं, यह स्त्री के आत्म-सम्मान, रिश्तों की गरिमा और एक समृद्ध पारिवारिक परंपरा का प्रतीक है। यह दिन प्रेम, सहयोग और सौहार्द का वह सेतु बनाता है जो हरियाली तीज के पर्व को और भी विशेष बना देता है।