*क्यों ज़रूरी है हमारे समाज को “शुभदा” जैसी संस्था?*
दिव्यांग यानी दिव्य अंग वाले लोग हमारे समाज का अहम हिस्सा हैं। लेकिन क्या हम सच में उनके बारे में सोचते हैं?

2011 की जनगणना के अनुसार अजमेर में करीब 3% और पूरे राजस्थान में 5,42,500 दिव्यांगजन हैं। यह संख्या बढ़ रही है, मगर सरकार और समाज—दोनों ही इनकी ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे।
सरकार योजनाएँ तो बनाती है, पर क्या ये योजनाएँ सही लोगों तक पहुँचती हैं?
अनेक दिव्यांगजन ऐसे हैं जिन्हें योजनाओं का नाम तक पता नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या हम खुद इनके लिए कुछ कर रहे हैं?

शुभदा की शुरुआत – एक मिशन, एक जज़्बा
2005 में वरिष्ठ पत्रकार स्व. श्री राहुल सेन ने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती साधना सेन के साथ मिलकर “शुभदा” नाम की एक गैर-सरकारी संस्था की स्थापना की।
संस्था राजस्थान रजिस्ट्रेशन एक्ट 1958 के तहत पंजीकृत है और मानसिक रूप से विशेष बच्चों के शिक्षण, प्रशिक्षण और पुनर्वास के लिए काम करती है।
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आज संस्था से 134 बच्चे और उनके परिवार जुड़े हैं।
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105 बच्चे रोजाना शुभदा केंद्र में आते हैं।
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29 बच्चों को विशेष शिक्षक और थेरेपिस्ट घर पर प्रशिक्षण देते हैं।
0 से 6 वर्ष तक के 18 बच्चे, 6 से 14 वर्ष तक के 57 बच्चे और 14 वर्ष से अधिक उम्र के 30 बच्चे यहाँ शिक्षण, प्रशिक्षण और थेरेपी पाते हैं।
अपूर्व सेन – आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प

संस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अपूर्व सेन बताते हैं कि शुभदा बच्चों को सिर्फ पढ़ाती नहीं, बल्कि जीने की कला सिखाती है।
यहाँ भाषा और संवाद क्षमता, व्यक्तित्व निर्माण, आत्मनिर्भरता, और विचारों के आदान-प्रदान पर खास ध्यान दिया जाता है।
संगीत, योगा, स्पीच थेरेपी, ऑक्युपेशनल और फिजियोथैरेपी जैसी गतिविधियों से हर बच्चे के लिए अलग कार्यक्रम तैयार किया जाता है।
त्यौहार भी परिवार की तरह

शुभदा में हर त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है ताकि बच्चे समाज का हिस्सा महसूस करें।
रक्षाबंधन और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर बच्चे और अभिभावक साथ मिलकर खुशी बांटते हैं।

बच्चों और अभिभावकों की मुस्कान ही सबसे बड़ी उपलब्धि

संस्था की बालिका हीरल बताती है—”शुभदा स्कूल नहीं, मेरा दूसरा घर है। यहाँ आकर मुझे पढ़ाई और नृत्य करना बहुत अच्छा लगता है।”
उसके माता-पिता भी मानते हैं कि शुभदा ने हीरल को आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाई है।
समाज और सरकार से अपील
ऐसी संस्थाओं को बढ़ावा दें। हर शहर में कम से कम एक ऐसा केंद्र जरूर हो जहाँ दिव्यांग बच्चों को शिक्षा के साथ मान-सम्मान भी मिले।

शुभदा जैसी संस्थाएँ हमारे समाज की ज़रूरत हैं—क्योंकि ये बच्चे सिर्फ सहानुभूति नहीं, अवसर चाहते हैं।