पैरा-स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर: पैरालंपिक में दो गोल्ड जीतने वालीं पहली भारतीय महिला अवनि लेखरा
अवनि लेखरा जब 13 साल की थीं तब उन्होंने स्पोर्ट्सपर्सन बनने का फ़ैसला किया.

अवनि को ये फ़ैसला लेने की प्रेरणा अभिनव बिंद्रा की आत्मकथा से मिली जो कि उस वक्त तक ओलंपिक की व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा में गोल्ड जीतने वाले एकमात्र भारतीय थे.लेखरा उस वक्त ये जानती थीं कि उन्हें अपनी मदद खुद करनी होगी.
दुर्घटना के बाद हो गई थीं बेहद कमजोर
अवनि के पिता प्रवीण बताते हैं कि दुर्घटना के बाद गुमसुम रहने लग गई थी। किसी से बात नहीं करती थी, पूरी तरह डिप्रेशन में चली गई थी। उन्होंने कहा कि भीषण दुर्घटना के कारण इसकी पीठ पूरी तरह काटनी पड़ी। इतनी कमजोर हो गई थी कि कुछ कर नहीं पाती थी। यहां तक की कोई हल्का सामान भी उठाना मुश्किल हो रहा था।
पैरालिसिस के बाद काफी टूट गई थीं अवनि
अवनि के माता-पिता ने कहा कि 12 साल की उम्र में जब अवनि को पैरालिसिस हुआ तो वह काफी टूट गई थीं। उस समय सोचा की अवनी को किसी खेल से जोड़ा जाए और काफी सोच-विचार के बाद मैंने इसे शूटिंग में हाथ आजमाने को कहा। अवनि के पिता ने कहा कि शूटिंग में पहली बार तो इससे गन तक नहीं उठी थी, मगर आज इसकी वजह से टोक्यो पैरालिम्पिक के पोडियम पर राष्ट्रगान गूंजेगा। खेल के साथ ही अवनी पढ़ाई में भी काफी होशियार हैं। इसके साथ ही अन्य क्रियाकलाप में भी अवनी सबसे अव्वल रहती हैं।

अवनि 23 साल की उम्र में पैरालंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी थीं. लेखरा ने यह कारमाना टोक्यो पैरालंपिक 2020 में 10 मीटर एयर राइफल एसएच 1 इवेंट में किया. हालांकि, कोरोना महामारी की वजह से टोक्यो पैरालंपिक का आयोजन 2021 में हुआ था.
अवनि ने फ़ाइनल में 249.6 का स्कोर बनाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड की बराबरी की और पैरालंपिक में नया रिकॉर्ड भी बनाया.

तीन साल बाद पेरिस पैरालंपिक 2024 में भी अवनि लेखरा ने गोल्ड मेडल जीता और पैरालंपिक में दो गोल्ड जीतने वालीं वो पहली भारतीय महिला बनीं.
अवनि लेखरा पैरालंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं.
इससे पहले सितंबर 2024 में मेडल समारोह के दौरान लेखरा ने बताया कि वो पेरिस गेम्स से पहले पूरी तरह से फ़िट नहीं थीं.
लेखरा ने कहा, “हाल ही मेरी गाल ब्लेडर सर्जरी हुई थी और मैं बेड रेस्ट पर थी. उससे बाहर आने के लिए मानसिक तौर पर मजबूती चाहिए थी और बहुत सारी ट्रेनिंग की भी ज़रूरत थी ताकि फ़िजिकल स्ट्रेंथ हासिल की जाए. ये पैरालंपिक पिछले वाले से मुश्किल रहा.”
हालांकि, शारीरिक चुनौतियों को पार करना ही अवनि लेखरा के सफ़र का केंद्र रहा है.
2012 में लेखरा के परिवार का कार एक्सीडेंट हुआ था. एक्सीडेंट के कारण अवनि को रीढ़ की हड्डी में चोट लगी और कमर से नीचे का हिस्सा पैरालाइज़्ड हो गया. अवनि को छह महीने तक बेड रेस्ट पर रहना पड़ा. लेकिन आगे की लड़ाई और ज़्यादा मुश्किल रही.
अवनि को सबकुछ नए सिरे से सीखना पड़ा जिसमें कैसे बैठना है, ये भी शामिल था. उन्हें भावनात्मक तौर पर भी बहुत कुछ झेलना पड़ा.
दो साल बाद जब अवनि स्कूल में वापसी करने को तैयार थीं तो उनके परिवार को ऐसा स्कूल खोजने में परेशानी आई जो कि विकलांग बच्चों के माकूल हो.
2015 में अवनि के पिता ने उन्हें घर से बाहर भेजने के लिए स्पोर्ट्स अपनाने को प्रोत्साहित किया. अवनि ने तैराकी, तीरंदाज़ी और एथलेटिक्स में हाथ आजमाए, लेकिन शूटिंग में उन्हें अपना लक्ष्य मिला.

टोक्यो में गोल्ड जीतने के बाद अवनि ने कहा, “एक बार गर्मी की छुट्टियों के दौरान मेरे पिता मुझे एक शूटिंग रेंज में लेकर गए. मुझे शूटिंग के प्रति कनेक्शन महसूस हुआ. मैंने कुछ निशाने लगाए और वो काफी ठीक थे. फोकस और निरंतरता वो बातें हैं जो शूटिंग के बारे में मुझे अच्छी लगीं.”
स्पोर्ट्स चुनने के बाद अवनि को स्कूल स्तर की प्रतियोगिताओं में पूरी तरह से फ़िट बच्चों की चुनौती का सामना करना पड़ा.
व्हीलचेयर पर होने की वजह से अवनि को जो अटेंशन मिल रहा था वो उसकी वजह से असहज भी होती थीं. बावजूद इसके अवनि तेजी से आगे बढ़ीं.
2017 में अवनि ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मेडल जीता. उन्होंने उस साल वर्ल्ड शूटिंग पैरा स्पोर्ट्स वर्ल्ड कप के 10 मीटर एयर राइफ़ल स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीता. इस इवेंट का गोल्ड मेडल स्लोवाकिया की वेरोनिका ने जीता.
उन्होंने कहा था, ”उस दिन मुझे महसूस हुआ कि मैं गोल्ड मेडल जीत सकती हूं. अगर मैं यहां तक आई हूं और अपने देश का प्रतिनिधितत्व कर रही हूं और व्हील्स पर रहते हुए सिल्वर जीता है तो मैं पैरालंपिक में भी मेडल जीत सकती हूं. उसके बाद मुझे बहुत प्रोत्साहन मिला.”