राजस्थान में दुर्गा पूजा की शुरुआत अजमेर से, 1928 में बंगाली समाज ने रखी परंपरा की नींव
बंगाल से दूर बसे परिवारों को अपने शहर में ही मां दुर्गा की आराधना का अवसर देने के लिए शुरू हुआ आयोजन, 1919 में खरीदी जमीन पर 1920 में रखी गई थी धर्मशाला की नींव
11 नवंबर 2023 को धर्मशाला परिसर में मां काली का मंदिर भी स्थापित किया गया, 16 से 21 अक्टूबर तक सजेगा दुर्गा पूजा महोत्सव; प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे कारीगर ।
शुभदा शक्ति न्यूज़।
बंगाल की धरती से दूर राजस्थान में बसे बंगाली परिवारों की आस्था ने अजमेर में ऐसी परंपरा को जन्म दिया, जो करीब एक सदी बाद भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। कचहरी रोड स्थित बंगाली हिंदू समाज धर्मशाला में वर्ष 1928 में सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई। उस दौर में अजमेर में रहने वाले बंगाली परिवारों को मां दुर्गा की आराधना और अपने पारंपरिक उत्सव में शामिल होने के लिए बंगाल जाना पड़ता था। ऐसे में समाज के लोगों ने अपने ही शहर में दुर्गा पूजा आयोजित करने की पहल की, ताकि परिवार एक साथ जुटकर बंगाल की परंपराओं के अनुरूप मां दुर्गा की आराधना कर सकें। धीरे-धीरे यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बंगाली समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक एकजुटता का प्रतीक बन गया।
समाज की इसी पहल से जुड़ा इतिहास बंगाली हिंदू समाज धर्मशाला की स्थापना तक जाता है। वित्तिय सचिव
संदीप चटर्जी के अनुसार वर्ष 1919 में समाज के लिए जमीन खरीदी गई और 6 सितंबर 1920 को धर्मशाला की नींव रखी गई। इसके बाद वर्ष 1928 में यहां सार्वजनिक दुर्गा पूजा की परंपरा शुरू हुई। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती यह परंपरा आज भी नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रही है। इसी धार्मिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए 11 नवंबर 2023 को धर्मशाला परिसर में मां काली का मंदिर भी स्थापित किया गया। अब दुर्गा पूजा के अवसर पर यहां धार्मिक आस्था, पारंपरिक कला और सांस्कृतिक गतिविधियों का संगम देखने को मिलेगा

बंगाल से अजमेर तक पहुंची परंपरा, अब राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा
दुर्गा पूजा बंगाली समाज के सबसे प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों में शामिल है। बंगाल में यह पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों के मिलन, पारंपरिक वेशभूषा, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, सामूहिक भोग और सामाजिक सहभागिता का अवसर भी होता है। अजमेर में बसे बंगाली परिवारों के लिए भी यह उत्सव अपनी जन्मभूमि की परंपराओं से जुड़े रहने का माध्यम बना।
वर्ष 1928 में शुरू हुई सार्वजनिक पूजा ने समाज को ऐसा साझा मंच दिया, जहां परिवार एक साथ मां दुर्गा की आराधना कर सकें। समय के साथ इस आयोजन में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आनंद मेले को भी स्थान मिला। आज यह आयोजन बुजुर्गों की आस्था और नई पीढ़ी की भागीदारी को जोड़ने का माध्यम है। बच्चे और युवा पूजा की परंपराओं को करीब से देखते हैं और समाज की सांस्कृतिक विरासत को समझते हैं।

1919 में खरीदी जमीन, 1920 में रखी गई धर्मशाला की नींव
अध्यक्ष देबाशीष बिस्वास ने बताया बंगाली हिंदू समाज धर्मशाला का इतिहास सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत से भी पहले का है। समाज की जरूरतों को देखते हुए वर्ष 1919 में जमीन खरीदी गई। इसके बाद 6 सितंबर 1920 को धर्मशाला की नींव रखी गई। यह स्थान धीरे-धीरे समाज के धार्मिक और सामाजिक आयोजनों का प्रमुख केंद्र बन गया।
धर्मशाला का महत्व केवल दुर्गा पूजा तक सीमित नहीं है। यहां समाज के लोग विभिन्न धार्मिक अवसरों पर एकत्र होते हैं और आपसी मेलजोल के साथ अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं। दुर्गा पूजा के दौरान इस स्थान पर विशेष रौनक रहती है। मां दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना से लेकर पूजा-अर्चना, भोग, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक पूरा आयोजन सामूहिक सहभागिता से जुड़ा रहता है।
11 नवंबर 2023 को स्थापित हुआ मां काली का मंदिर

बंगाली हिंदू समाज की धार्मिक परंपरा में मां दुर्गा के साथ मां काली की आराधना का भी विशेष महत्व है। इसी आस्था को आगे बढ़ाते हुए 11 नवंबर 2023 को धर्मशाला परिसर में मां काली का मंदिर स्थापित किया गया। इससे परिसर की धार्मिक पहचान और मजबूत हुई तथा श्रद्धालुओं को मां काली की आराधना के लिए भी स्थान मिला। मां दुर्गा की सार्वजनिक पूजा और मां काली के मंदिर की स्थापना समाज की उस परंपरा को दर्शाती है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक विरासत को सहेजने पर भी जोर दिया जाता है। दुर्गा पूजा के दौरान यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह परिसर विशेष महत्व रखता है।
प्रतिमाओं में नजर आएगी बंगाल की पारंपरिक कला
दुर्गा पूजा महोत्सव को लेकर धर्मशाला परिसर में तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। मां दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में कारीगर जुटे हैं। प्रतिमाओं को आकार देने, रंग भरने, आभूषणों से सजाने और पारंपरिक स्वरूप प्रदान करने का काम किया जा रहा है। प्रतिमाओं की बारीक कारीगरी में कारीगरों की मेहनत दिखाई दे रही है।
बंगाली परंपरा के अनुसार होने वाली पूजा में प्रतिमाओं की सजावट, धार्मिक विधियों और आरती का विशेष महत्व रहता है। महोत्सव के दौरान पुष्पांजलि, भोग, संध्या आरती और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी। आनंद मेले में भी समाज के लोग उत्साह के साथ भाग लेंगे।
16 से 21 अक्टूबर तक होंगे धार्मिक अनुष्ठान
महा सचिव तरुण चटर्जी के अनुसार इस वर्ष बंगाली हिंदू समाज धर्मशाला में 16 से 21 अक्टूबर तक दुर्गा पूजा महोत्सव आयोजित होगा। षष्ठी के अनुष्ठानों से शुरुआत के बाद सप्तमी, महा अष्टमी और महा नवमी पर विशेष पूजा होगी। विजयादशमी के दिन दर्पण विसर्जन और सिंदूरदान के साथ महोत्सव का समापन होगा।

आस्था के साथ नई पीढ़ी को विरासत से जोड़ने का प्रयास
करीब एक सदी से चली आ रही दुर्गा पूजा की यह परंपरा अजमेर में बसे बंगाली समाज के लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने का माध्यम है। बंगाल से दूर रहने के बावजूद समाज के लोगों ने अपने धार्मिक रीति-रिवाजों, पूजा पद्धति और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखा है। हर साल होने वाला आयोजन परिवारों को एक मंच पर लाता है और बच्चों व युवाओं को अपनी विरासत से परिचित कराता है। वर्ष 1928 में शुरू हुई सार्वजनिक पूजा से लेकर वर्ष 2023 में मां काली के मंदिर की स्थापना तक का सफर समाज की निरंतर धार्मिक सहभागिता को दर्शाता है। इस बार भी 16 से 21 अक्टूबर तक धर्मशाला में होने वाला दुर्गा पूजा महोत्सव मां की आराधना, पारंपरिक कला और सामाजिक एकजुटता का संगम बनेगा।






