प्रवेश, भर्ती और छात्रवृत्ति का विवरण 30 सितंबर तक देने के निर्देश; सुलभ परिसर और सहायता व्यवस्था पर जोर
नई दिल्ली। विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलने के बाद भी यदि कोई विद्यार्थी कक्षा, पुस्तकालय या अध्ययन सामग्री तक आसानी से नहीं पहुंच सके, तो समान अवसर का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। दिव्यांग विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों से दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने को कहा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की 14 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, संस्थानों को दिव्यांग विद्यार्थियों के प्रवेश, शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती तथा छात्रवृत्ति और फेलोशिप से संबंधित जानकारी 30 सितंबर 2026 तक UGC के विश्वविद्यालय गतिविधि निगरानी पोर्टल—UAMP—पर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। यह संस्थानों के लिए विवरण जमा करने की समयसीमा है, विद्यार्थियों के प्रवेश या छात्रवृत्ति आवेदन की अंतिम तिथि नहीं।
सुलभ परिसर और सहायता समिति पर ध्यान
रिपोर्ट के मुताबिक, विश्वविद्यालयों और संबद्ध कॉलेजों को परिसर की सुगम्यता के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाने को भी कहा गया है। इसके साथ शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों और अभिभावकों की भागीदारी वाली आंतरिक समिति गठित करने का निर्देश है। यह समिति दिव्यांग विद्यार्थियों की दैनिक जरूरतों और सहायता संबंधी व्यवस्थाओं पर ध्यान देगी। समान अवसर प्रकोष्ठ के प्रभावी संचालन पर भी जोर दिया गया है।
आरक्षण का प्रावधान पहले से मौजूद
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 32 के अनुसार, सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों में बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए कम से कम पांच प्रतिशत सीटों का आरक्षण निर्धारित है। इसलिए इसे नया आरक्षण घोषित किए जाने के रूप में नहीं समझना चाहिए। यहां महत्वपूर्ण विषय मौजूदा अधिकारों का प्रभावी अनुपालन है।
पढ़ाई में भागीदारी कैसे होगी आसान?
व्यावहारिक रूप से सुलभ शिक्षा के लिए भवन में प्रवेश से लेकर कक्षा में सीखने तक की पूरी प्रक्रिया पर ध्यान देना जरूरी है। उदाहरण के तौर पर, व्हीलचेयर उपयोगकर्ता के लिए सुगम रास्ता और उपयोग योग्य शौचालय, दृष्टिबाधित विद्यार्थी के लिए पढ़ने योग्य डिजिटल सामग्री तथा श्रवणबाधित विद्यार्थी के लिए उपयुक्त संचार सहायता उपयोगी हो सकती है।
अलग-अलग विद्यार्थियों की आवश्यकताएं अलग होती हैं। इसलिए सुविधाओं की योजना बनाते समय उनसे संवाद करना और उनकी प्रतिक्रिया के आधार पर सुधार करना बेहतर तरीका होगा। आवेदन पत्र, सूचनाएं और सहायता पाने की प्रक्रिया भी आसानी से समझ आने वाली होनी चाहिए।

शुभदा शक्ति का दृष्टिकोण
संस्थानों से आंकड़े मांगना जवाबदेही की दिशा में उपयोगी कदम हो सकता है। इसका वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देगा, जब जानकारी के आधार पर कमियों की पहचान और उनका समाधान हो। दिव्यांग विद्यार्थियों को सम्मानपूर्वक अपनी बात रखने, सहायता प्राप्त करने और शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए।
आपके शहर के कॉलेज और विश्वविद्यालय दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए कितने सुलभ हैं? अपने अनुभव और सुझाव कमेंट में साझा करें।






