काशी में इन 5 तरह के शवों का क्यों नहीं होता दाह संस्कार? ‘मोक्ष की नगरी’ की सदियों पुरानी मान्यताओं का रहस्य

वाराणसी। काशी को सनातन परंपरा में ‘मोक्ष की नगरी’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां प्राण त्यागने या अंतिम संस्कार होने पर जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है। इसी काशी में स्थित मणिकर्णिका घाट देश के सबसे प्रसिद्ध महाश्मशानों में से एक है, जहां सदियों से अंतिम संस्कार होते आए हैं। लेकिन इस घाट से जुड़ी कुछ ऐसी परंपराएं और मान्यताएं भी प्रचलित हैं, जिनके अनुसार कुछ विशेष परिस्थितियों में शव का सामान्य तरीके से अग्नि संस्कार नहीं किया जाता।
आखिर वे कौन-सी परिस्थितियां हैं और इनके पीछे क्या मान्यताएं बताई जाती हैं?
1. साधु-संत
प्रचलित धार्मिक परंपरा के अनुसार कई संप्रदायों के साधु-संतों की मृत्यु के बाद सामान्य गृहस्थ की तरह उनका दाह संस्कार नहीं किया जाता। उन्हें पहले से ही सांसारिक मोह-माया से विरक्त माना जाता है। इसलिए संप्रदाय और परंपरा के अनुसार उनके पार्थिव शरीर को भू-समाधि या जल-समाधि दी जा सकती है।
2. छोटे बच्चे
हिंदू अंतिम संस्कार की कुछ परंपराओं में बहुत कम आयु के बच्चों के शवों को अग्नि देने के बजाय दफनाने या अन्य विधि से अंतिम संस्कार करने की प्रथा मिलती है। काशी के संबंध में कई लोकप्रिय विवरणों में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का उल्लेख किया जाता है। हालांकि उम्र और विधि को लेकर अलग-अलग समुदायों की परंपराएं अलग हो सकती हैं।
3. गर्भावस्था के दौरान मृत्यु
काशी से जुड़ी प्रचलित मान्यताओं में गर्भवती महिला की मृत्यु को भी विशेष परिस्थिति माना गया है। इसके पीछे गर्भस्थ शिशु से संबंधित धार्मिक अवधारणाएं बताई जाती हैं। हालांकि इसे सभी हिंदू समुदायों पर लागू होने वाला सार्वभौमिक नियम मानना उचित नहीं है।
4. सर्पदंश से मृत्यु
सर्पदंश से मृत्यु के संबंध में भी एक पुरानी लोकमान्यता प्रचलित है कि ऐसे शव को अग्नि नहीं दी जाती और कुछ परंपराओं में जल-प्रवाह की बात कही जाती है। इससे जुड़ी ‘शरीर में कई दिनों तक प्राण रहने’ जैसी बातें धार्मिक या लोकविश्वास हैं, इन्हें आधुनिक चिकित्सा का वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। सर्पदंश की स्थिति में व्यक्ति को तत्काल अस्पताल ले जाना ही जरूरी है।
5. कुष्ठ या गंभीर चर्म रोग
कुछ लोकप्रिय विवरणों में कुष्ठ अथवा गंभीर चर्म रोग से पीड़ित व्यक्ति के शव को भी इस सूची में शामिल किया गया है। इसके पीछे बीमारी फैलने जैसी व्याख्याएं दी जाती रही हैं। लेकिन ऐसी व्याख्याओं को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का स्थापित निष्कर्ष समझना सही नहीं होगा।
क्या सचमुच डोम शव को लौटा देते हैं?
यहीं इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। इसे इस तरह समझना ठीक नहीं कि डोम समुदाय मनमाने ढंग से किसी शव को देखकर अंतिम संस्कार से इनकार कर देता है। मणिकर्णिका घाट की अंतिम संस्कार व्यवस्था में डोम समुदाय की ऐतिहासिक और धार्मिक भूमिका रही है। अलग-अलग समुदायों, संप्रदायों और परिवारों में अंतिम संस्कार की विधियां भी अलग हो सकती हैं।
काशी का मणिकर्णिका घाट इसलिए केवल एक श्मशान नहीं, बल्कि मृत्यु, जीवन और मोक्ष से जुड़ी सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं का केंद्र भी है। इन मान्यताओं को समझते समय धार्मिक विश्वास, लोककथा और वैज्ञानिक तथ्य के बीच अंतर करना बेहद जरूरी है।
नोट: लेख में वर्णित बातें काशी और हिंदू अंतिम संस्कार से जुड़ी प्रचलित धार्मिक एवं लोकमान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें सभी समुदायों पर लागू सार्वभौमिक नियम या वैज्ञानिक तथ्य न माना जाए।







