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जी,सुना क्या ?? UN के नए World Map पर भारत का कढा ऐतराज, पाकिस्तान भी कूदा !

दुनिया का नक्शा बदलने के प्रस्ताव पर भारत ने दिया वोट, फिर क्यों जताई आपत्ति? पाकिस्तान भी कूदा, समझिए पूरा विवाद

नई दिल्ली/न्यूयॉर्क। जिस दुनिया के नक्शे को हम बचपन से किताबों, एटलस और स्क्रीन पर देखते आए हैं, अब उसी को लेकर संयुक्त राष्ट्र में बड़ी बहस छिड़ गई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर 2026 को ‘Correct the Map’ प्रस्ताव पारित किया, जिसका उद्देश्य दुनिया के देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही अनुपात में दिखाने वाले नक्शों को बढ़ावा देना है। भारत ने भी इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। लेकिन इसके कुछ ही समय बाद भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के चित्रण को लेकर सख्त चेतावनी दे दी। अब पाकिस्तान भी इस विवाद में कूद पड़ा है।

सवाल उठता है—जब भारत ने प्रस्ताव का समर्थन किया, तो फिर आपत्ति किस बात पर है?

पहले समझिए, दुनिया के मौजूदा नक्शे में समस्या क्या है?

दुनिया में लंबे समय से Mercator Projection वाला नक्शा प्रचलित रहा है। इसे 1569 में जेरार्डस मर्केटर ने विकसित किया था। समुद्री नेविगेशन के लिए यह बेहद उपयोगी था, लेकिन इसमें पृथ्वी के गोल आकार को समतल सतह पर उतारने के कारण देशों और महाद्वीपों के आकार में भारी अंतर दिखाई देता है।

इसका सबसे चर्चित उदाहरण अफ्रीका और ग्रीनलैंड है। Mercator नक्शे में दोनों का आकार लगभग समान नजर आ सकता है, जबकि वास्तविकता में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। ध्रुवों के करीब स्थित क्षेत्रों का आकार इस projection में वास्तविकता से बहुत बड़ा दिखाई देता है।

इसी असमानता को दूर करने के लिए अफ्रीकी देशों के नेतृत्व में ‘Correct the Map’ अभियान आगे बढ़ा।

UN में क्या हुआ?

टोगो के नेतृत्व में लाए गए प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा में जबरदस्त समर्थन मिला। 164 देशों ने पक्ष में वोट दिया, अमेरिका अकेला देश था जिसने विरोध किया, जबकि छह देश मतदान से अलग रहे। प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, यानी इसके पारित होते ही दुनिया के सभी नक्शे बदलना अनिवार्य नहीं हो जाएगा।

इसका मकसद ऐसे equal-area map projections को बढ़ावा देना है जिनमें देशों और महाद्वीपों का क्षेत्रफल उनके वास्तविक अनुपात के ज्यादा करीब दिखाई दे।

भारत ने समर्थन क्यों किया?

भारत ने स्पष्ट किया कि वह नक्शों में महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को अधिक सही तरीके से दिखाने के सिद्धांत का समर्थन करता है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि ने कहा कि अलग-अलग map projections अलग-अलग उद्देश्यों के लिए उपयोगी होते हैं और किसी एक projection को हर काम के लिए सही नहीं माना जा सकता।

भारत ने खास तौर पर यह भी स्पष्ट किया कि उसके समर्थन का मतलब Equal Earth या किसी एक खास नक्शे को आधिकारिक मंजूरी देना नहीं है।

फिर भारत को ऐतराज क्यों?

यहीं इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

भारत का कहना है कि प्रस्ताव का उद्देश्य महाद्वीपों के आकार और क्षेत्रफल को सही अनुपात में दिखाना है, न कि देशों की राजनीतिक सीमाएं तय करना।

विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि भारत के संप्रभु क्षेत्र—विशेष रूप से केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—भारत के आधिकारिक नक्शे के अनुसार ही दिखाए जाने चाहिए। किसी भी गलत या भ्रामक चित्रण को भारत स्वीकार नहीं करेगा। भारत ने अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर अपने रुख को स्पष्ट, निरंतर और गैर-समझौतावादी बताया है।

यानी भारत के वोट और उसकी आपत्ति में विरोधाभास नहीं है। भारत ने ‘दुनिया के भूभागों का आकार सही दिखाने’ के सिद्धांत को वोट दिया है, किसी विशेष राजनीतिक सीमा वाले नक्शे को नहीं।

पाकिस्तान क्यों कूदा?

भारत की इस स्थिति के सामने आने के बाद पाकिस्तान ने भी जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया और भारत के दावे को खारिज करते हुए अपने पुराने रुख को दोहराया। इससे तकनीकी रूप से शुरू हुई ‘दुनिया का नक्शा कैसा दिखना चाहिए’ वाली बहस एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के पुराने कश्मीर विवाद तक पहुंच गई।

क्या अब हमारी किताबों का नक्शा बदल जाएगा?

तुरंत नहीं। UN का प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है। इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अलग-अलग सरकारें, स्कूल, प्रकाशक, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और डिजिटल मैपिंग कंपनियां भविष्य में equal-area projections को कितना अपनाती हैं।

लेकिन इतना तय है कि करीब साढ़े चार सौ साल पुराने Mercator नक्शे को लेकर शुरू हुई यह बहस अब केवल भूगोल तक सीमित नहीं रही। एक नक्शे में देश कितना बड़ा दिखाई देता है और उसकी सीमा कहां दिखाई जाती है—इन दोनों सवालों ने भूगोल के साथ कूटनीति और राजनीति को भी जोड़ दिया है।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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