‘1971 भूल गए क्या?’ पाकिस्तान में आसिम मुनीर पर बरसे मौलाना फजलुर रहमान, 93 हजार सैनिकों के सरेंडर की दिलाई याद

पेशावर/इस्लामाबाद, 24 अगस्त 2026। पाकिस्तान की राजनीति में सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच टकराव एक बार फिर खुलकर सामने आया है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (F) यानी JUI-F के प्रमुख और वरिष्ठ पाकिस्तानी नेता मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और सैन्य प्रतिष्ठान पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का जिक्र करते हुए पाकिस्तानी सेना को उस ऐतिहासिक हार और ढाका में हुए आत्मसमर्पण की याद दिलाई।
1971 की हार का जिक्र कर सेना पर निशाना
पेशावर में JUI-F के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के ताकत दिखाने वाले रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश की रक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे पहले भी किए गए हैं और इतिहास बताता है कि ऐसे दावों का अंत क्या हुआ।
फजलुर रहमान ने दिसंबर 1971 की घटनाओं को याद करते हुए तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति और सैन्य शासक जनरल याह्या खान के उन दावों का उल्लेख किया, जिनमें आखिरी दम तक लड़ने की बातें कही गई थीं। रहमान ने तंज कसते हुए कहा कि ऐसी “बड़ी-बड़ी बातें हमने तब भी सुनी थीं।”
93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों के आत्मसमर्पण की याद
1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ युद्ध 13 दिनों में निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया था। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। करीब 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों और संबंधित कर्मियों के आत्मसमर्पण का यह घटनाक्रम पाकिस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य पराजयों में गिना जाता है। इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर स्वतंत्र बांग्लादेश बना।
फजलुर रहमान ने इसी इतिहास का हवाला देते हुए मौजूदा सैन्य नेतृत्व को संदेश देने की कोशिश की कि केवल ताकत के दावे करना पर्याप्त नहीं है।
‘जनता परेशान है तो आप ताकत का प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?’
फजलुर रहमान ने पाकिस्तान की मौजूदा परिस्थितियों को लेकर भी सैन्य प्रतिष्ठान से सवाल किए। उनका कहना था कि जब आम जनता मुश्किलों का सामना कर रही है, तब सत्ता और ताकत का प्रदर्शन करने के बजाय उसकी परेशानियों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने लंबे समय से जारी हिंसा और रक्तपात को लेकर चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ऐसी परिस्थितियां लगातार बनी रहती हैं, तो इनके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि दशकों तक रक्तपात जारी रहना भौगोलिक बदलावों का संकेत बन सकता है।
संसद की शक्तियां एक व्यक्ति के हाथ में देने का आरोप
फजलुर रहमान का हमला केवल 1971 के इतिहास तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान में जो अधिकार संसद और संघीय सरकार के पास होने चाहिए, वे सैन्य प्रतिष्ठान के एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित होते जा रहे हैं।
उन्होंने आसिम मुनीर पर निशाना साधते हुए कहा कि किसी के सेना प्रमुख, चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज या फील्ड मार्शल होने पर उन्हें आपत्ति नहीं है, लेकिन संसद से संबंधित शक्तियों का एक व्यक्ति के हाथ में जाना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने विपक्षी दलों से संसद के भीतर एकजुट होकर इसका विरोध करने की अपील भी की।
पाकिस्तान में सेना बनाम सियासत की बहस फिर तेज
फजलुर रहमान के इन बयानों ने पाकिस्तान में एक बार फिर सेना की राजनीतिक भूमिका और संसद की सर्वोच्चता को लेकर बहस तेज कर दी है। खास बात यह है कि इस बार उन्होंने मौजूदा सैन्य नेतृत्व पर हमला करने के लिए सीधे 1971 की हार का उदाहरण दिया है—एक ऐसा अध्याय जो पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक इतिहास में आज भी बेहद संवेदनशील माना जाता है।






