संस्कृति की जड़ें हैं गरबा, सहेजना सबकी जिम्मेदारी
गुजरात का पवित्र आराधना नृत्य ; गरबाआज भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में भारतीय संस्कृति की एक विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुका है। मां जगदंबा की आराधना के शारदीय नवरात्र में गरबा से सीधा तात्पर्य मां भगवती की भक्ति से है। जिसमें हजारों-हजारों श्रद्धालु एक वृत्त में माताजी की आराधना को गरबा से व्यक्त करते हैं। मौजूदा परिवेश में इस नौ दिवसीय वृह्द आयोजन में जहां मां शक्ति की भक्ति प्रतीत होती है, वहीं कई विसंगतियों ने भी इसमें प्रवेश कर लिया है

गुजरात का पवित्र आराधना नृत्य ‘गरबा’ आज भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में भारतीय संस्कृति की एक विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुका है। मां जगदंबा की आराधना के शारदीय नवरात्र में गरबा से सीधा तात्पर्य मां भगवती की भक्ति से है। जिसमें हजारों-हजारों श्रद्धालु एक वृत्त में माताजी की आराधना को गरबा से व्यक्त करते हैं। मौजूदा परिवेश में इस नौ दिवसीय वृह्द आयोजन में जहां मां शक्ति की भक्ति प्रतीत होती है, वहीं कई विसंगतियों ने भी इसमें प्रवेश कर लिया है। यह विसंगतियां अब कुछ ऐसी हावी होती जा रही है कि धार्मिक श्रद्धा से ओत-प्रोत इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने रखने की जिम्मेदारी सबकी बन जाती है।
गरबा गुजरात, राजस्थान और मालवा प्रदेश में भी प्रचलित है। आरंभ में देवी मां के निकट घट (कलश) में दीप ले जाने के क्रम में यह नृत्य होता था। यह घट दीपगर्भ कहलाता था। कालांतर में वर्ण लोप से यहीं शब्द गरबा बन गया। गरबा सौभाग्य का प्रतीक है और अश्विन मास की नवरात्र में मनाते हैं। इसे ठीक से समझे तो नवरात्र की पहली रात्रि को स्थापित गरबा में चार ज्योति प्रज्वलित कर उसके चारों ओर श्रद्धालु आराधना गीत से फेरे (चक्कर) लगाते हैं। गरबा नृत्य में ताली, चुटकी, खंजरी, डंडा, मंजीरा आदि का प्रयोग ताल देने के लिए होता है। स्त्रियां समूह में भगवती मां व कृष्णलीला संबंधी भक्ति गाती हैं। शाक्त-शैव समाज के ये गीत गरबा और वैष्णव अर्थात् राधाकृष्ण के वर्णन वाले गीत गरबा कहे जाते हैं।

गरबा व डांडिया रास में महिला-पुरुष परंपरागत वेशभूषा में नवरात्र के नौ दिन मां जगदंबा की आराधना में भाग लेते हैं। गुजरात के गांव-देहात तो आज भी गरबा पारंपरिक डोर को पकड़े हुए हैं। यहां तक कि शहरों में भी पुराने गली-मोहल्ले में ‘शेरी गरबा’ भी धार्मिक व सामाजिक महत्व बरकरार रखे हुए हैं, लेकिन बड़ा बदलाव जहां आया है वहां गरबा महोत्सव में व्यावसायिक प्रवृत्ति हावी होती दिखाई देती है। यह प्रवृत्ति समाज के बड़े-बुजुर्गों को भी अब खलने लगी है। उनका मानना है कि उत्सव भारतीय संस्कृति की वो जड़ें हैं, जो सात समंदर पार भी लोगों को भारतीयता के साथ जोड़कर रखती है। विदेश में नवरात्र के गरबा कार्यक्रम आज भी धार्मिक-सामाजिक कलेवर का चोला ओढ़ा हुए हो रहे हैं और यहां यह चोला दिखावटी कार्यक्रमों में तार-तार हो रहा है। शक्ति की भक्ति के पर्व में गरबा के दौरान बॉलीवुड कल्चर, विलासिता की झलक दिखाते पंडाल और डिस्को-पब जैसी थिरकन की भला क्या आवश्यकता? उनका मानना है कि गौरवमयी भारतीय संस्कृति से आज की तरुणाई विमुख होते जा रही है और पाश्चात्य ढंग से उत्सव मनाती है।गरबा पंडालों में जिस तरह से कुछ खास वर्ग के लोगों के प्रवेश को रोकने के जतन किए जाने लगे हैं, उतने ही अधिक प्रयास प्रत्येक वर्ष नवरात्र पर्व की शुरुआत से पहले ही बड़े होते बच्चों को परम्परागत गरबा नृत्य का धार्मिक महत्व बताने-समझाने के लिए किए जाएं तो व्यावसायिक पंडाल में भी परम्परा का निर्वहन बखूबी होता दिखेगा। अन्यथा मौजूदा स्थिति तो केवल इस बात से भली-भांति समझा जा सकता है कि कार्यक्रम की शुरुआत में जब माताजी की आरती होती है, तब चंद खेलैया ही वहां मौजूद होते हैं। यदि गरबा का महत्व नई पीढ़ी को समझाया नहीं गया तो आने वाली नस्लों को तो यह केवल गूगल, विकीपीडिया जैसे सर्च इंजन पर ही मिल पाएगा।
क्या है गरबा और डांडिया का सांस्कृतिक महत्व
गरबा का शाब्दिक अर्थ है “गर्भ” या “अंदर का दीपक”। यह देवी शक्ति की आराधना का प्रतीक है। नवरात्रि के दौरान, लोग मिट्टी के एक मटके में दीप जलाते हैं, जिसे “गरबी” कहा जाता है। इस मटके को देवी दुर्गा की शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, और इसके चारों ओर लोग गरबा नृत्य करते हैं। गरबा नृत्य करते समय जो गोल घेरा बनाया जाता है, वह जीवन चक्र और देवी दुर्गा की अनंत शक्ति का प्रतीक है।गरबा नृत्य आमतौर पर देवी दुर्गा की स्तुति में गाए जाने वाले भक्ति गीतों के साथ किया जाता है। यह नृत्य उन भक्तों की आस्था और भक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो देवी से जीवन में प्रकाश और ऊर्जा की कामना करते हैं।
क्या है गरबे का धार्मिक महत्व
