माँ की लाड़ो (श्रुति): संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक का प्रेरक सफर
डॉक्टर्स ने कहा—कुछ नहीं हो सकता, लेकिन माँ ने हार नहीं मानी
दुनियाँ में आई तो रोई नहीं महीने बीते तो माँ की हूँ हा का कोई जवाब नहीं ।

नाम मिला
“ख़ास बच्ची”
डॉक्टर्स ने कहाँ कुछ नहीं हो सकता – वो असामान्य है.
सामान्य स्कूल में दाखिला—एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह
स्कूल गई तो दाख़िला सामान्य बच्चों के साथ कैसे???????
एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह
श्रुति की ढाल बन खड़ी हुई – माँ
माँ ने हार नहीं मानी – अपनी बच्ची के लिए घंटों एक सामान्य स्कूल में स्वंय बैठी , बस मन में चाह की मेरी बच्ची सामान्य बच्चों की तरह जीवन जिए ।
सामान्य बच्चों संग शिक्षा क्या लाभकारी रही ??
सामान्य बच्चों के साथ रहकर सामान्य बच्चों की तरह कार्य करने की चेष्ठा सैदव श्रुति में बनी रही ।
रास्ता कठिन था _ _ _
इच्छाशक्ति प्रबल हो तो पहाड़ की चोटी भी पास दिखाई देने लगती है ।
कार्यों को कुशलता से करना ,पढ़ने में अपना मन लगाना कक्षा में अच्छे अंक लाना ये भाव थे जो श्रुति को सामान्य स्कूल में जाकर अनुभव करने का मौका मिला ।
दसवीं तक की शिक्षा प्राप्त करना , मिलों दूर का रास्ता पार करने समान था ।
कहानी में एक मोड़ आया…
परिवार को रोज़ परिजनों की सलाह यहाँ भेझो सही हो जाएगी ,वहाँ क्यों नहीं भेजते कुछ सीखेगी । श्रुति को भी माँ- पापा ने ना चाहते हुए ,सही हो बच्ची इस लालसा में जयपुर एक विशेष स्कूल में दाखिला करवाया ।
विशेष स्कूल जाकर एक साल में श्रुति का वजन करीब सात-आठ किलो बढ़ा । कारण पोष्टिक भोजन का आभाव श्रुति को स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा।
श्रुति के मम्मी पापा दोनों ने अपनी बच्ची के भावों को समझते हुए उसे वापस अपने पास लाना उचित समझा ।

रोज़ एक नया अनुभव, रोज़ एक नया संघर्ष
जिस तरह सामान्य बच्चा अलग अलग गतिविधियों में व्यस्त रहता है श्रुति को भी कभी डांस क्लास , कभी स्पीच थैरेपी, कभी ब्यूटी पार्लर का कोर्स करवाया गया ।
हमारे इस समाज में एक सामान्य को अपने लिए एक जगह बनाने अथक प्रयास करने होते है , तो श्रुति को तो प्रभु ने थोड़ी कमी के साथ धरती पर भेजा है ।
रोज़ एक नया अनुभव ,रोज़ एक नया संघर्ष
कभी कभी सामान्य बच्चों द्वारा श्रुति की अवहेलना करना – श्रुति को चिड़चिड़ा बनाता ।
“माँ में सुंदर नहीं हूँ”
इसलिए कोई मुझ से बात नहीं करता
आईने में देख अपने ही गालों पर थप्पड़ लगाना ।
मैं सब जैसी क्यों नहीं ?????????
बोल ख़ुद को कोसना इस और इशारा करता है की मन तो सब का होता है । भावनाएं सब के दिलों में होती है ।
और हम सामान्य जन सोचते है इनको क्या पता चलता है।

माँ का श्रुति पर भरोसा श्रुति की ताक़त बना।
आज श्रुति साधारण ख़ास बच्ची से विशेष ख़ास बच्ची बन गई है लंबे समय के संघर्ष के बाद श्रुति को राह मिली । श्रुति ने कला की दुनियाँ में अपना कदम रखा और अपना छोटा सा व्यवसाय प्रारंभ किया ।
‘रचना- बाय श्रुति’ से मिली नई उड़ान

नाम रखा : रचना- बाय “श्रुति”
ऑर्डर लेना ,ऑर्डर पूरा कटने की लगन, बिल बनाना ,सब श्रुति के जीवन को उड़ान दे रहे है । जो श्रुति रात को सो नहीं पाती थी बैचेन रहती थी ,काम करते करते थक कर अपने कार्य स्थल पर ही नींद की गोद में
अगले ऑर्डर के सपने देखने लगती है ।
माँ को अपने व्यवसाय में सहयोगी बना रखा है और एक ही बात दोहराती है आप बस मेरे काम में मेरी मदद कर रहे हो । काम मेरा है
भगवान ने ख़ास बना कर भेजा—विचित्र नहीं
भगवान ने ख़ास बना कर भेजा – विचित्र नहीं सामान्य बच्चे से बस थोड़ा सा सोचने समझने की शक्ति कम दी इसका मतलब ये नहीं की श्रुति जैसे बच्चे दुनियाँ में जीने के लिए भी संघर्ष करे ।






