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जी,सुना क्या ?? अजमेर में गूंजेगी बांग्ला संस्कृति, सजेगा मां दुर्गा का भव्य दरबार।

41 साल से मां दुर्गा की पूजा, चुनौतियों के बीच अजमेर में बांग्ला संस्कृति संजो रहा समाज।

 

रेलवे बीसीटी से शुरू हुई परंपरा अब वैशाली नगर के दीनदयाल गार्डन तक पहुंची। आयोजकों का आरोप—बार-बार मांग और पत्राचार के बावजूद प्रशासन, जनप्रतिनिधि और संबंधित विभाग स्थायी समाधान नहीं दे पाए। सीमित संसाधनों के बावजूद 100 से अधिक परिवारों की आस्था और बांग्ला संस्कृति को सहेजने के लिए हर साल सजता है मां का दरबार।

शुभदा शक्ति न्यूज़। कोलकाता से दूर अजमेर में बांग्ला संस्कृति और परिवेश को जीवंत बनाए रखना आसान नहीं है। इसके बावजूद बंगाली समाज की गीतांजलि कल्चरल एंड वेफेयर सोसाइटी पिछले 41 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा की परंपरा निभा रहा है। हर साल आयोजन स्थल बदलने, सीमित संसाधनों और कई चुनौतियों के बीच आयोजक भव्य पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी करते हैं—क्योंकि उनके लिए यह आयोजन केवल पूजा नहीं, अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास भी है।

कमेटी मेंबर गीताली दास ने बताया अजमेर में पूजा की शुरुआत रेलवे बीसीटी से हुई थी। समय के साथ आयोजन अलग-अलग स्थानों पर होता रहा और इस वर्ष वैशाली नगर स्थित दीनदयाल गार्डन में मां दुर्गा का दरबार सजेगा। गीतांजलि कल्चरल एंड वेलफेयर सोसायटी की ओर से 16 से 21 अक्टूबर तक 41वीं शारदीय दुर्गा पूजा आयोजित की जा रही है। आयोजन से 100 से अधिक परिवार जुड़े हैं, जिन्हें हर साल नए पूजा स्थल की जानकारी देनी पड़ती है।

अथक प्रयासों के बाद भी स्थायी समाधान नहीं।

कमेटी के कोषाध्यक्ष प्रवीर कुमार दास का कहना है कि पूजा के लिए स्थायी स्थान तय कराने के वास्ते नगर निगम के अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों को कई बार लिखित पत्र दिए गए हैं। लगातार प्रयासों के बावजूद अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं मिला। हर साल नई जगह पर आयोजन की व्यवस्था करना, श्रद्धालुओं तक पता पहुंचाना और पूजा की तैयारियां संभालना आयोजकों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।

समाज का कहना है कि चार दशक से अधिक पुरानी इस परंपरा को स्थायित्व मिलना चाहिए। स्थायी स्थान मिलने से पूजा की तैयारियां बेहतर ढंग से हो सकेंगी और श्रद्धालुओं को हर बार नए पंडाल तक पहुंचने की परेशानी भी नहीं होगी।

सीमित संसाधनों में संस्कृति को सहेजने की कोशिश।

आयोजकों के लिए यह पूजा अजमेर में बांग्ला संस्कृति और परिवेश को जीवित रखने का माध्यम है। कोलकाता और बंगाल से दूर बसे परिवार इस आयोजन के जरिए अपनी परंपराओं से जुड़ते हैं और बच्चों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराते हैं। आयोजकों का कहना है कि अनेक चुनौतियों और सीमित संसाधनों के बावजूद वे हर साल पूरे उत्साह से कार्यक्रम करते हैं, ताकि अजमेर में बांग्ला संस्कृति की यह परंपरा आगे बढ़ती रहे।

विसर्जन के लिए साफ पानी और पर्याप्त जगह की मांग।

स्थायी पूजा स्थल के साथ संस्था ने प्रतिमा विसर्जन की व्यवस्था में सुधार की मांग भी उठाई है। संस्था के कोषाध्यक्ष के अनुसार, नगर निगम की ओर से अग्निशमन विभाग में अस्थायी कुंड बनाकर प्रतिमाओं का विसर्जन कराया जाता है, लेकिन वहां पानी की स्वच्छता और बड़ी प्रतिमाओं के लिए पर्याप्त जगह को लेकर परेशानी होती है।

उनका कहना है कि प्रतिमा के आकार के कारण विसर्जन के दौरान उसे संभालना कठिन हो जाता है। स्थिति ऐसी बनती है कि प्रक्रिया पूरी करने के लिए प्रतिमा पर पैर रखना पड़ता है, जिससे श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं। संस्था ने विसर्जन स्थल की समीक्षा कर साफ पानी, पर्याप्त जगह और सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।

16 से 21 अक्टूबर तक होंगे खास आयोजन । 

आयोजकों को उम्मीद है कि उनकी वर्षों पुरानी मांग पर प्रशासन, जनप्रतिनिधि और संबंधित विभाग गंभीरता से विचार करेंगे। समाज चाहता है कि मां दुर्गा की पूजा को स्थायी स्थान मिले और विसर्जन की व्यवस्था श्रद्धा व सम्मान के अनुरूप हो—ताकि चुनौतियों के बीच अजमेर में संजोई जा रही बांग्ला संस्कृति की यह परंपरा आने वाले वर्षों में भी पूरे उत्साह से जारी रहे।

APOORV SEN
Author: APOORV SEN

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